लिक्विडिटी (Liquidity) का बढ़ता असंतुलन
भारतीय बैंकों के लिए लिक्विडिटी की स्थिति टाइट होती जा रही है। क्रेडिट ग्रोथ, डिपॉजिट ग्रोथ से 4% ज्यादा है। इसका मतलब है कि बैंक जिस रफ्तार से लोन बांट रहे हैं, उस रफ्तार से उनके पास पैसा (डिपॉजिट) नहीं आ रहा। इस गैप को भरने के लिए बैंकों को फंड जुटाने के लिए मशक्कत करनी पड़ रही है, जिससे आने वाले समय में फंड की लागत (Cost-of-funds) बढ़ने की आशंका है। मौजूदा क्रेडिट-टू-डिपॉजिट रेशियो (Credit-to-Deposit Ratio) बताता है कि शॉर्ट-टर्म लेंडिंग के लिए बैंकों के पास मौजूद बफर (Cushion) कम हो रहा है, जो इंटरबैंक रेट्स (Interbank Rates) में अस्थिरता ला सकता है।
औद्योगिक लोन में क्यों आई गिरावट?
भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं (Geopolitical Volatility) के चलते कंपनियों का सेंटीमेंट कमजोर है, जिससे फिक्स्ड एसेट्स (Fixed Asset) में निवेश कम हो रहा है। अप्रैल के महीने में बड़े औद्योगिक लोन 1.1% तक सिकुड़ गए। छोटे और मझोले उद्योगों (MSMEs) के लोन में भी ऐसी ही गिरावट देखी गई। यह कोई अस्थायी कमी नहीं, बल्कि बढ़ती इनपुट कॉस्ट और सप्लाई चेन के जोखिमों का नतीजा है। यह कॉरपोरेट बरोइंग पैटर्न (Corporate Borrowing Pattern) में एक बड़ा बदलाव दिखाता है, जहां कंपनियां विस्तार की बजाय कर्ज घटाने पर ध्यान दे रही हैं। औद्योगिक सेक्टर में नए कर्ज की यह कमी बताती है कि डोमेस्टिक कैपिटल एक्सपेंडिचर (Domestic Capital Expenditure) अभी धीमी रफ्तार से ही आगे बढ़ेगा।
सोने पर मिले लोन (Gold Loans) का बढ़ता सहारा
जहां एक ओर इंडस्ट्रियल लेंडिंग कमजोर पड़ रही है, वहीं सोने पर मिले फाइनेंसिंग में ₹4.9 लाख करोड़ की बढ़ोतरी हुई है। यह दिखाता है कि लोग अब लिक्विडिटी के लिए क्रेडिट कार्ड या पर्सनल लोन की जगह अपने पास रखे सोने का इस्तेमाल कर रहे हैं। लेकिन, यह ट्रेंड कहीं न कहीं घरेलू वित्तीय तनाव (Household Financial Stress) की ओर इशारा करता है। अगर सोने की कीमतों में बड़ी गिरावट आती है, तो बैंकों को मार्जिन कॉल्स (Margin Calls) का सामना करना पड़ सकता है और ऐसे सेगमेंट में NPA (Non-Performing Assets) बढ़ सकते हैं, जिसे पहले कम जोखिम वाला माना जाता था।
आगे क्या हो सकता है? (Forensic Bear Case)
अगर डिपॉजिट ग्रोथ, लोन बांटने की दर के बराबर नहीं हुई तो बैंकिंग सेक्टर लिक्विडिटी संकट (Liquidity Squeeze) के प्रति और भी ज्यादा संवेदनशील हो जाएगा। एनालिस्ट्स का कहना है कि मिड-साइज़्ड बैंकों पर इसका ज्यादा असर पड़ सकता है, क्योंकि उनके पास बड़े सरकारी बैंकों जैसी डिपॉजिट फ्रेंचाइजी (Deposit Franchise) नहीं है। इसके अलावा, सोने पर ज्यादा निर्भरता, जो अक्सर आखिरी उपाय होता है, यह बताता है कि महंगाई के कारण कंज्यूमर खर्च (Consumer Discretionary Spending) पर दबाव है। अगर औद्योगिक गिरावट जारी रहती है, तो सोने के लोन, कॉर्पोरेट क्रेडिट के नुकसान की भरपाई नहीं कर पाएंगे, जिससे आने वाली तिमाहियों में नेट इंटरेस्ट मार्जिन (Net Interest Margin) पर दबाव आ सकता है। रेगुलेटरी जांच (Regulatory Scrutiny) भी बढ़ने की उम्मीद है, क्योंकि कृषि और पर्सनल गोल्ड लोन के वर्गीकरण में विसंगतियां बनी हुई हैं।
