क्रेडिट कार्ड से बड़े सामानों की EMI बनवाने का मतलब सिर्फ हर महीने किश्त चुकाना नहीं है। ब्याज़ के अलावा, प्रोसेसिंग फीस और टैक्स आपकी जेब पर भारी पड़ सकते हैं। इन छुपे हुए खर्चों को समझना और क्रेडिट लिमिट पर इनके असर को जानना बहुत ज़रूरी है।
भारत में कई क्रेडिट कार्ड यूजर्स के लिए, बड़ा सामान खरीदने के बाद उसे आसान मंथली किश्तों (EMI) में बदलना कैश फ्लो को संभालने का एक लोकप्रिय तरीका है। लेकिन, इस सुविधा की कीमत अक्सर विज्ञापित की गई मासिक किश्त से कहीं ज़्यादा होती है। वित्तीय विशेषज्ञ और कंज्यूमर रिपोर्ट्स लगातार चेतावनी देते हैं कि EMI प्लान्स किसी भी खरीद के लिए सबसे सस्ते नहीं होते, क्योंकि कुल लागत अक्सर एकमुश्त भुगतान से काफी ज़्यादा निकलती है।
EMI के असल खर्च को समझें
जब कोई ग्राहक EMI प्लान चुनता है, तो वह असल में अपने क्रेडिट कार्ड पर एक तरह का लोन ले रहा होता है। इन प्लान्स पर लगने वाली ब्याज दरें काफी ज़्यादा हो सकती हैं, जो अक्सर सालाना डबल डिजिट में पहुँच जाती हैं। सिर्फ ब्याज़ ही नहीं, बैंक और वित्तीय संस्थान अक्सर प्रोसेसिंग फीस भी वसूलते हैं, जो एक फ्लैट चार्ज या कुल ट्रांजैक्शन वैल्यू का एक निश्चित प्रतिशत हो सकती है। इसके अलावा, गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (GST) ब्याज़ और प्रोसेसिंग फीस, दोनों पर लगता है, जिससे ग्राहक द्वारा चुकाई जाने वाली कुल राशि और बढ़ जाती है।
'नो-कॉस्ट EMI' के झांसे से रहें सावधान
मार्केटिंग में अक्सर 'नो-कॉस्ट EMI' जैसे ऑफर्स दिखाए जाते हैं, जिससे लगता है कि ग्राहक को सिर्फ प्रोडक्ट की ओरिजिनल कीमत ही किश्तों में चुकानी होगी। लेकिन, इन ऑफर्स में अक्सर मर्चेंट द्वारा सब्सिडी दी जाती है या कुछ छुपे हुए एडमिनिस्ट्रेटिव चार्ज जुड़े हो सकते हैं। भले ही ब्याज़ माफ़ हो जाए, पर प्रोसेसिंग फीस और टैक्स अभी भी लग सकते हैं। आमतौर पर, कार्ड जारी करने वाली कंपनी लोन एग्रीमेंट के 'फाइन प्रिंट' में इन चार्जेस का जिक्र करती है, लेकिन कई ग्राहक कम मासिक किश्त के लालच में इन शर्तों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं।
क्रेडिट लिमिट और खर्च की आदतों पर असर
सीधे पैसों के खर्च के अलावा, EMI में सामान खरीदने से आपके क्रेडिट कार्ड की उपलब्ध लिमिट भी कम हो जाती है। खरीद की पूरी मूल राशि को आमतौर पर कार्ड की कुल क्रेडिट लिमिट के अगेंस्ट ब्लॉक कर दिया जाता है, जिससे आप दूसरे ज़रूरी ट्रांजैक्शन नहीं कर पाते। यह उपलब्ध क्रेडिट तब तक कम रहता है जब तक मूल राशि का भुगतान नहीं हो जाता, जिससे कार्डहोल्डर की वित्तीय फ्लेक्सिबिलिटी सीमित हो जाती है।
इसके अलावा, हर महीने छोटी-छोटी किश्तों में भुगतान करने की आसानी से कई EMI प्लान्स जमा हो सकते हैं। अगर इसे एक सख्त बजट के साथ मैनेज न किया जाए, तो यह कर्ज का एक ऐसा चक्र बन सकता है जहाँ नई खरीद और मौजूदा EMI का भुगतान मुश्किल हो जाता है। अगर कोई यूजर तय अवधि से पहले EMI प्लान बंद करना चाहता है, तो कार्ड जारी करने वाले फोरक्लोजर फीस भी वसूल सकते हैं, जो एक और संभावित लागत बढ़ा देती है। इन प्लान्स के लिए हामी भरने से पहले, ग्राहकों को सलाह दी जाती है कि वे सिर्फ मासिक किश्त की राशि पर ध्यान देने के बजाय, लोन की पूरी अवधि के दौरान चुकाई जाने वाली कुल राशि का आकलन करें।
