भारतीय बैंकों के लिए एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है! अब कॉर्पोरेट कर्ज, खासकर ऊर्जा और इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र से, रिटेल लोन की तुलना में ज़्यादा तेज़ी से बढ़ रहा है। जहाँ रिन्यूएबल एनर्जी जैसे क्षेत्र मांग बढ़ा रहे हैं, वहीं ऑटो और हाउसिंग लोन जैसे रिटेल सेगमेंट धीमे पड़ रहे हैं। निवेशकों को यह देखना होगा कि कर्ज के इस बदलते मिश्रण और बढ़ती फंडिंग लागत का बैंकों के मुनाफे पर क्या असर पड़ेगा।
कॉर्पोरेट लोन में आई तूफानी तेजी
भारतीय बैंकों के लिए जून 2026 को समाप्त होने वाली तिमाही में एक बड़ा बदलाव नज़र आ रहा है। लंबे समय तक जहां पर्सनल और होम लोन जैसे रिटेल लोन ग्रोथ में सबसे आगे थे, अब कहानी पलट गई है। नए आंकड़े बताते हैं कि कॉर्पोरेट क्रेडिट, रिटेल की तुलना में तेज़ी से बढ़ रहा है। यह बिजनेस को फिर से कर्ज देने की ओर एक बड़ा कदम है।
रिन्यूएबल एनर्जी से लेकर इंफ्रा तक, क्यों बढ़ी कॉर्पोरेट लोन की मांग?
कॉर्पोरेट लोन की मांग मुख्य रूप से रिन्यूएबल एनर्जी, पावर इंफ्रास्ट्रक्चर और डेटा सेंटर जैसे पूंजी-गहन क्षेत्रों से आ रही है। जैसे-जैसे ये उद्योग बढ़ रहे हैं, उन्हें बड़े पैमाने पर फंडिंग की ज़रूरत पड़ रही है। उदाहरण के लिए, Axis Bank ने अपने कॉर्पोरेट लोन बुक में 38% की मजबूत ग्रोथ दर्ज की है। यह इस व्यापक उद्योग ट्रेंड को दर्शाता है, जहाँ कई बैंकों के लिए कॉर्पोरेट क्रेडिट का विस्तार 10% से 18% सालाना रहा है।
रिटेल लोन की रफ्तार हुई धीमी
इसके विपरीत, जो रिटेल लेंडिंग सेगमेंट कई बैंकों के लिए ग्रोथ का मुख्य जरिया था, वह अब धीमा हो गया है। अधिकांश बड़े बैंकों के लिए ग्रोथ रेट 7% से 12% तक आ गया है। State Bank of India (SBI) ने 15% की ग्रोथ दर्ज की है, जो एक महत्वपूर्ण अपवाद बना हुआ है, लेकिन आम तौर पर, बैंकों में होम लोन और ऑटो लोन की मांग कम देखी जा रही है। ऑटो लोन पर आक्रामक प्राइसिंग और पर्सनल लोन व क्रेडिट कार्ड जैसे असुरक्षित लोन को लेकर बैंकों के सतर्क रुख जैसे कई कारण इस मंदी के पीछे हैं।
सोने के कर्ज में दिखी चमक
हालांकि, रिटेल कैटेगरी में मंदी के बावजूद, सोने के कर्ज (Gold Loans) वाला एक खास सेगमेंट अभी भी तेज़ी दिखा रहा है। ये लोन बैंक पोर्टफोलियो में एक चमकदार स्पॉट बनकर उभरे हैं, भले ही अन्य रिटेल सेगमेंट मुश्किलों का सामना कर रहे हों।
मार्जिन पर दबाव और फंडिंग की चुनौती
कॉर्पोरेट लेंडिंग की ओर इस बदलाव और असुरक्षित रिटेल लोन में आई मंदी ने बैंक की प्रॉफिटेबिलिटी के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। बैंक वर्तमान में अपने प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव का सामना कर रहे हैं। इसकी एक बड़ी वजह उनके फंडिंग मिक्स में बदलाव है। कम लागत वाली चालू और बचत खाता (CASA) डिपॉजिट हासिल करना मुश्किल होता जा रहा है, जिससे बैंकों को अपने लेंडिंग एक्टिविटीज़ को फंड करने के लिए महंगी टर्म डिपॉजिट पर निर्भर रहना पड़ रहा है। जैसे-जैसे इन डिपॉजिट को जुटाने की लागत बढ़ेगी, बैंकों को अपने नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIMs) पर लगातार दबाव का सामना करना पड़ सकता है।
निवेशकों के लिए आगे क्या?
निवेशकों के लिए, मुख्य निगरानी बिंदु यह होगा कि बैंक सुरक्षित कॉर्पोरेट लोन और उच्च-मार्जिन वाले, लेकिन जोखिम भरे, रिटेल लोन के बीच संतुलन कैसे बनाते हैं। इसके अलावा, जैसे-जैसे बैंक कॉर्पोरेट और इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्रों में अपना एक्सपोजर बढ़ाएंगे, एसेट क्वालिटी बनाए रखने और बैड लोन में वृद्धि को रोकने की उनकी क्षमता आने वाली तिमाही नतीजों में ट्रैक करने के लिए एक महत्वपूर्ण कारक होगी।
