मुंबई कंज्यूमर कोर्ट ने EPFO को फटकार लगाई है। एक रिटायर्ड कर्मचारी के **₹14.06 लाख** के क्लेम को निपटाने में **35 दिन** की देरी करने पर अब संस्था को **6%** ब्याज का भुगतान करना होगा।
मुंबई सबर्बन डिस्ट्रिक्ट कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल कमिशन ने अपने एक अहम फैसले में EPFO की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। नियम के मुताबिक, 'Employees' Provident Fund Scheme 1952' के तहत संस्था को क्लेम सेटलमेंट 20 दिन के भीतर करना होता है। लेकिन इस मामले में 35 दिन की देरी हुई, जिसे कोर्ट ने 'डेफिसिएंसी इन सर्विस' माना है।
क्यों लिया गया यह फैसला?
EPFO ने तर्क दिया था कि दस्तावेज अधूरे थे, लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया क्योंकि संस्था कोई भी लिखित सबूत या रिजेक्शन लेटर पेश नहीं कर सकी। कोर्ट ने EPFO को 45 दिन का समय दिया है कि वे ब्याज के साथ क्लेम की रकम का भुगतान करें।
EPFO में हो रहे बड़े बदलाव
भले ही यह एक कानूनी झटका हो, लेकिन संस्था अपनी सर्विस सुधारने के लिए कई बड़े बदलाव कर रही है:
- ऑटो-सेटलमेंट लिमिट: अब ₹5 लाख तक के क्लेम के लिए ऑटो-सेटलमेंट की सुविधा दी जा रही है, जो 3 दिन में प्रोसेस हो जाते हैं।
- UPI इंटीग्रेशन: जल्द ही PF का पैसा सीधे UPI के जरिए बैंक अकाउंट में ट्रांसफर किया जा सकेगा।
- सरल प्रक्रिया: निकासी के 13 अलग-अलग प्रावधानों को घटाकर 3 मुख्य कैटेगरी में बांटा गया है, ताकि कागजी कार्यवाही का बोझ कम हो सके।
यह फैसला उन लाखों सब्सक्राइबर्स के लिए एक बड़ी राहत है जो अक्सर फंड मिलने में देरी की समस्याओं का सामना करते हैं।
