साल 2026 की पहली छमाही में भारतीय इन्वेस्टमेंट बैंकिंग सेक्टर में Citigroup ने बाजी मार ली है। जहां पूरे इंडस्ट्री का कुल फीस पूल **20%** घटकर **$614.1 मिलियन** रह गया है, वहीं Citigroup ने **$60.3 मिलियन** की कमाई के साथ टॉप स्थान हासिल किया है।
रणनीतिक बदलाव और M&A का कमाल
इन्वेस्टमेंट बैंकिंग के बदलते परिदृश्य में Citigroup की सफलता का मुख्य राज 'मर्जर एंड एक्विजिशन' (M&A) एडवाइजरी पर उनका फोकस रहा है। जहां ट्रेडिशनल फंडरेजिंग एक्टिविटीज सुस्त पड़ी हैं, वहीं बैंक ने $30.2 बिलियन की डील्स में एडवाइजरी देकर इस सेगमेंट में 34.7% का बड़ा मार्केट शेयर हासिल किया है। यह रणनीति कंपनी को गिरते राजस्व के बीच भी मजबूती प्रदान कर रही है।
बाजार में कड़ी प्रतिस्पर्धा
इंडस्ट्री में फीस पूल कम होने से होड़ बढ़ गई है। Kotak Investment Banking जैसे घरेलू दिग्गज भी अपनी जगह बचाने के लिए लगातार संघर्ष कर रहे हैं। अब मुकाबला इस बात का है कि कौन ग्लोबल दिग्गज और कौन सी डोमेस्टिक फर्म हाई-वैल्यू डील्स को अपने पाले में कर पाती है।
आगे क्या है निवेशकों के लिए?
इन्वेस्टमेंट बैंकिंग सेक्टर अभी 'एडजस्टमेंट फेज' से गुजर रहा है। निवेशकों को मुख्य रूप से दो चीजों पर नजर रखनी चाहिए:
- मार्केट वोलैटिलिटी: बाजार में अनिश्चितता के कारण IPO और अन्य फंडरेजिंग प्लांस में देरी हो रही है, जिसका सीधा असर बैंकों की कमाई पर पड़ता है।
- मैक्रो-इकोनॉमिक फैक्टर: ब्याज दरों और वैश्विक भू-राजनीतिक हालात (Geopolitical developments) का विदेशी निवेश पर असर पड़ेगा, जो डील पाइपलाइन को प्रभावित कर सकता है।
