Citibank India ने ₹1 लाख करोड़ का आंकड़ा पार कर लिया है। पिछले 12 महीनों में इन संस्थागत क्लाइंट एसेट्स में **30%** की जबरदस्त ग्रोथ देखी गई है। यह बड़ी उपलब्धि बैंक के कंस्यूमर बैंकिंग बिज़नेस बेचने के बाद कॉर्पोरेट बैंकिंग पर ध्यान केंद्रित करने की रणनीति का नतीजा है।
₹1 लाख करोड़ के पार पहुंची कॉर्पोरेट एसेट्स
Citibank N.A. India ने घोषणा की है कि उनके संस्थागत क्लाइंट एसेट का पोर्टफोलियो ₹1 लाख करोड़ के पार निकल गया है। यह पिछले बारह महीनों में 30% की महत्वपूर्ण वृद्धि दर्शाता है। इस दौरान बैंक ने अपने पोर्टफोलियो में लगभग ₹24,000 करोड़ जोड़े हैं। यह ग्रोथ इसलिए भी अहम है क्योंकि यह बैंक की तीन साल पहले भारत में कंस्यूमर बैंकिंग से हटने की रणनीति के बाद आई है।
कॉर्पोरेट फोकस की ओर बड़ा कदम
यह उपलब्धि मार्च 2023 में एक्सिस बैंक को कंस्यूमर बैंकिंग बिज़नेस (क्रेडिट कार्ड, रिटेल बैंकिंग और वेल्थ मैनेजमेंट) बेचने के बाद एक बड़ा टर्नअराउंड है। उस डील में 3,200 कर्मचारी और कई रिटेल एसेट्स शामिल थे, लेकिन संस्थागत बिज़नेस को अलग रखा गया था। तब से, बैंक ने अपने संस्थागत एसेट बेस को लगभग दोगुना कर दिया है, जो ₹53,000 करोड़ से बढ़कर वर्तमान स्तर पर पहुंच गया है, और अब पूरी तरह से कॉर्पोरेट और संस्थागत क्लाइंट्स पर केंद्रित है।
ग्रोथ के मुख्य कारण
बैंक का कहना है कि यह ग्रोथ क्लाइंट की बढ़ती मांग और बाजार की बदलती जरूरतों का मिलाजुला नतीजा है। हालिया एसेट वृद्धि का लगभग 60% सीधे लोन से आया है, जिसमें वर्किंग कैपिटल और ट्रेड फाइनेंसिंग शामिल हैं। बाकी पोर्टफोलियो में कॉर्पोरेट बॉन्ड और पास-थ्रू सर्टिफिकेट जैसे स्ट्रक्चर्ड फाइनेंसिंग सॉल्यूशंस शामिल हैं। यह बिज़नेस मॉडल बड़ी कॉर्पोरेशन्स और मल्टीनेशनल कंपनियों की कैपिटल एक्सपेंडिचर और ट्रेड एक्टिविटी पर निर्भर करता है। जैसे-जैसे ये कंपनियां अपनी सप्लाई चेन का विस्तार कर रही हैं, लिक्विडिटी मैनेजमेंट और रिस्क मिटिगेशन टूल्स की मांग स्वाभाविक रूप से बढ़ी है।
सेक्टर का संदर्भ और जोखिम
जहां बैंक की 30% की ग्रोथ रेट भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा रिपोर्ट की गई 17.7% की सामान्य बैंक क्रेडिट ग्रोथ से अधिक है, वहीं निवेशकों को इस विशेष सेगमेंट के अंतर्निहित जोखिमों से अवगत रहना चाहिए। चूंकि इस ग्रोथ का एक बड़ा हिस्सा स्ट्रक्चर्ड फाइनेंसिंग और एसेट-बैक्ड सिक्योरिटीज से आता है, इसलिए पोर्टफोलियो इंटरेस्ट रेट साइकल्स के प्रति संवेदनशील है। यदि ब्याज दरें अस्थिर रहती हैं, तो सीक्योरिटाइज्ड डेट का मार्केट वैल्यू घट-बढ़ सकता है, जिसका असर बैंक की बैलेंस शीट पर पड़ सकता है।
इसके अलावा, पोर्टफोलियो का प्रदर्शन व्यापक मैक्रोइकोनॉमिक माहौल से गहराई से जुड़ा हुआ है। भू-राजनीतिक तनाव जो वैश्विक व्यापार प्रवाह को बाधित करते हैं, मल्टीनेशनल कॉरपोरेशन्स की बैलेंस शीट को प्रभावित कर सकते हैं, जिससे उनके फाइनेंसिंग की मांग पर असर पड़ सकता है। इसके अतिरिक्त, चूंकि पोर्टफोलियो काफी हद तक कॉर्पोरेट संस्थाओं पर निर्भर करता है, घरेलू कैपिटल एक्सपेंडिचर साइकिल में कोई भी मंदी भविष्य में क्रेडिट की मांग को कम कर सकती है या क्रेडिट क्वालिटी पर दबाव डाल सकती है।
इस बिज़नेस के लिए मुख्य निगरानी यह रहेगी कि कॉर्पोरेट निवेश की गति कितनी बनी रहती है और बैंक अपनी स्ट्रक्चर्ड फाइनेंस पोर्टफोलियो को संभावित आर्थिक मंदी के खिलाफ कितनी प्रभावी ढंग से प्रबंधित करता है। बैंकिंग सेक्टर पर नजर रखने वाले निवेशक इस बात पर अपडेट का इंतजार करेंगे कि क्या व्यापक कॉर्पोरेट माहौल में चुनौतियों का सामना करने पर यह तेजी बरकरार रह पाती है।
