Centrum Broking: विदेशी निवेश (FII) के लिए भारत में मैक्रो स्थिरता जरूरी

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AuthorAditya Rao|Published at:
Centrum Broking: विदेशी निवेश (FII) के लिए भारत में मैक्रो स्थिरता जरूरी

Centrum Broking के जिग्नेश देसाई का कहना है कि विदेशी निवेशकों (FIIs) की बिकवाली का दौर भले ही थम गया हो, लेकिन आगे आने वाला कैपिटल इनफ्लो (Capital Inflow) कच्चे तेल की कीमतों, रुपये की स्थिरता और कंपनी नतीजों पर निर्भर करेगा। उन्होंने भारतीय शेयरों में जोखिम-इनाम का संतुलन ठीक बताया है, मगर बढ़ती ग्लोबल बॉन्ड यील्ड्स और मौसम जनित महंगाई को बड़ा खतरा माना है।

विदेशी निवेश पर Centrum Broking की राय

Centrum Broking के इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज के CEO, जिग्नेश देसाई ने कहा है कि भारतीय शेयर बाजार में विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) की भारी बिकवाली का दौर अब कम होता दिख रहा है। हालांकि, जुलाई और अगस्त 2026 की शुरुआत में नेट इनफ्लो (Net Inflow) देखने को मिला है, लेकिन इस मोमेंटम को बनाए रखने के लिए एक स्थिर माहौल की जरूरत होगी। भारत में विदेशी पूंजी का प्रवाह जारी रखने के लिए, बाजार को उम्मीद है कि कंपनी के नतीजों (Earnings) में लगातार बढ़ोतरी होगी, साथ ही रुपये और कच्चे तेल की कीमतों में भी स्थिरता देखने को मिलेगी।

वैल्युएशन (Valuation) और जोखिम

वैल्युएशन के नज़रिए से देखें तो भारतीय बाजार इस समय उचित जोन (Fair Zone) में है। निफ्टी (Nifty) अपने फाइनेंशियल ईयर 2027 के अनुमानित नतीजों के मुकाबले 20 गुना से भी कम पर ट्रेड कर रहा है, जो इसके ऐतिहासिक औसत से नीचे है। यह बताता है कि बाजार बहुत महंगा नहीं है, हालांकि स्टॉक चुनने में समझदारी दिखानी होगी।

वैश्विक ब्याज दरों (Global Interest Rates) का मूवमेंट एक बड़ा जोखिम है। विदेशी निवेशकों के लिए कैपिटल की लागत (Cost of Capital) वैश्विक बॉन्ड यील्ड्स से बहुत प्रभावित होती है। Centrum Broking ने 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड यील्ड (10-year Government Bond Yield) के 7.3% से 7.5% के दायरे को एक महत्वपूर्ण स्तर माना है। अगर यील्ड्स लगातार इस स्तर से ऊपर बढ़ती हैं, तो भारतीय इक्विटीज (Equities) उतने आकर्षक नहीं रहेंगे। प्राइवेट बैंक, जिनमें विदेशी हिस्सेदारी लगभग 41% है, इन वैश्विक यील्ड्स के बदलावों के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील हैं।

घरेलू चिंताएं और अवसर

बाजार हाल की चिंताओं से भले ही उबर गया हो, लेकिन घरेलू खपत (Domestic Consumption) और महंगाई (Inflation) को लेकर कुछ चिंताएं बनी हुई हैं। खासकर, मॉनसून का फसलों पर असर एक संभावित दबाव का बिंदु हो सकता है। अगर बारिश कम रहती है, तो सप्लाई चेन (Supply Chain) बाधित हो सकती है और खाद्य महंगाई बढ़ सकती है, जो कॉर्पोरेट नतीजों के अनुमानों में शामिल खपत में रिकवरी की उम्मीदों को प्रभावित कर सकती है। निवेशक देखेंगे कि क्या कंपनियां इन दबावों के बावजूद अपनी अर्निंग ग्रोथ (Earnings Growth) बनाए रख पाती हैं।

अवसरों की बात करें तो मिड-कैप (Mid-cap) और स्मॉल-कैप (Small-cap) सेगमेंट ने मजबूती दिखाई है, जहां अर्निंग ग्रोथ अक्सर लार्ज-कैप कंपनियों से बेहतर रही है। मैन्युफैक्चरिंग (Manufacturing), डिफेंस (Defense) और इलेक्ट्रॉनिक्स इकोसिस्टम (Electronics Ecosystem) जैसे स्ट्रक्चरल ग्रोथ थीम्स (Structural Growth Themes) में काफी दिलचस्पी है। ट्रांसमिशन और ग्रिड इक्विपमेंट (Transmission and Grid Equipment), सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग (Semiconductor Manufacturing) और डेटा सेंटर इंफ्रास्ट्रक्चर (Data Center Infrastructure) जैसे क्षेत्र भी लंबी अवधि के निवेशकों के लिए प्रमुख फोकस एरिया के रूप में उभर रहे हैं।

आगे क्या देखें?

आने वाले महीनों में निवेशकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज अर्निंग विजिबिलिटी (Earnings Visibility) होगी। जैसे-जैसे बाजार पैसिव इंडेक्स-बेस्ड इन्वेस्टमेंट (Passive Index-based Investment) से आगे बढ़ रहा है, प्राइमरी रिसर्च के आधार पर स्टॉक चुनने की क्षमता - जैसे सप्लाई चेन चेक और कंपनी-विशिष्ट फंडामेंटल्स - अधिक महत्वपूर्ण होती जा रही है। निवेशक इस पर नज़र रखेंगे कि आगामी कॉर्पोरेट रिजल्ट्स (Corporate Results) बिना किसी बड़े डाउनग्रेड के अनुमानित ग्रोथ की पुष्टि करते हैं या नहीं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.