केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने Reliance Commercial Finance (RCFL) और Reliance Home Finance (RHFL) के पूर्व मुख्य कार्यकारी अधिकारियों (CEO) को एक बड़े बैंक धोखाधड़ी मामले में गिरफ्तार किया है। आरोप है कि इन्होंने **₹7,623 करोड़** की बैंक के पैसे को Reliance ADA ग्रुप की कंपनियों में डायवर्ट किया।
क्या हुआ?
केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने रिलायंस ग्रुप की दो वित्तीय कंपनियों, Reliance Commercial Finance Limited (RCFL) और Reliance Home Finance Limited (RHFL) के पूर्व शीर्ष अधिकारियों को एक बड़े बैंक धोखाधड़ी के आरोप में गिरफ्तार किया है। सोमवार को देवंग मोदी (RCFL के पूर्व डायरेक्टर और CEO) और रवींद्र सुधाल्कर (RHFL के पूर्व एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर और CEO) को हिरासत में लिया गया। CBI की जांच के मुताबिक, इन दोनों कंपनियों ने मिलकर पब्लिक सेक्टर के बैंकों के साथ ₹7,623 करोड़ की धोखाधड़ी की है।
धोखाधड़ी के आरोप
जांच में यह आरोप लगाया गया है कि RCFL और RHFL ने विभिन्न पब्लिक सेक्टर के बैंकों और लाइफ इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (LIC) से लिए गए कर्ज का पैसा रिलायंस ADA ग्रुप की अन्य कंपनियों में डायवर्ट कर दिया। CBI ने इंटरमीडियरी और कंड्यूट कंपनियों को दिए गए लोन को नेशनल हाउसिंग बैंक (NHB) और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के नियमों का सीधा उल्लंघन बताया है।
नुकसान का आंकड़ा काफी बड़ा है: RCFL के मामले में 13 पब्लिक सेक्टर बैंकों को ₹4,097 करोड़ का नुकसान हुआ, जबकि RHFL की जांच में 10 पब्लिक सेक्टर बैंकों को ₹3,526 करोड़ का नुकसान बताया जा रहा है। जांच से पता चलता है कि ये लोन, कंपनियों की अपनी लोन पॉलिसी और संवितरण की शर्तों के विपरीत दिए गए थे, जिससे संबंधित कंपनियों को गलत फायदा हुआ और बैंकों को भारी वित्तीय नुकसान उठाना पड़ा।
बिज़नेस की स्थिति और दिवालियापन
RCFL और RHFL दोनों ही अनिल अंबानी के रिलायंस ADA ग्रुप का हिस्सा थीं। पिछले कुछ सालों से ये कंपनियाँ वित्तीय संकट और कानूनी मामलों के जाल में फँसी हुई हैं।
इनकी पैरेंट कंपनी Reliance Capital, इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) के तहत कॉरपोरेट इंसॉल्वेंसी रेजोल्यूशन प्रोसेस (CIRP) से गुज़र रही है। CBI और प्रवर्तन निदेशालय (ED) जैसी एजेंसियां ग्रुप के पुराने वित्तीय व्यवहारों की बड़े पैमाने पर जांच कर रही हैं। चूँकि ये कंपनियाँ अभी रेजोल्यूशन या लिक्विडेशन की प्रक्रिया में हैं, इसलिए इन पर लगे धोखाधड़ी के आरोप, मौजूदा इंसॉल्वेंसी रेजोल्यूशन प्रोसेस से अलग हैं, जिसे लेनदारों के दावों को पूरा करने के लिए नियुक्त पेशेवरों द्वारा संभाला जा रहा है।
कानूनी और नियामक स्थिति
यह गिरफ्तारी रिलायंस कम्युनिकेशंस और रिलायंस टेलीकॉम जैसी रिलायंस ग्रुप की अन्य कंपनियों से जुड़े सात FIRs में शामिल एक बड़े CBI जांच का हिस्सा है। इन मामलों पर भारत के सुप्रीम कोर्ट की भी नज़र है।
नियामक और प्रवर्तन एजेंसियों ने कई सालों से फंड के फ्लो की जांच की है, खासकर पब्लिक सेक्टर बैंकों द्वारा इन लोन खातों को फ्रॉड के रूप में फ्लैग करने के बाद। इन हालिया गिरफ्तारियों के अलावा, ग्रुप के कुछ अन्य पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों को भी मनी लॉन्ड्रिंग और बैंकिंग धोखाधड़ी की जांच में नामज़द किया गया है या चार्जशीट में शामिल किया गया है।
निवेशकों के लिए क्या है ट्रैक करने लायक?
चूंकि RCFL और RHFL पहले से ही इंसॉल्वेंसी और नियामक जांच के दायरे में हैं, इसलिए एक्टिव पब्लिक मार्केट पर इनका सीधा असर सीमित है, क्योंकि ये कंपनियाँ सक्रिय रूप से ट्रेड नहीं कर रही हैं। हालांकि, बैंकिंग सेक्टर के निवेशकों के लिए, मुख्य बात यह है कि इन रिकवरी प्रोसीडिंग्स का क्या नतीजा निकलता है। कानूनी प्रक्रिया यह तय करेगी कि क्या बैंक अपने खोए हुए फंड में से किसी हिस्से को वसूल कर पाते हैं, जो प्रभावित पब्लिक सेक्टर बैंकों के प्रोविजनिंग और बैड-लोन रिकवरी मेट्रिक्स को प्रभावित करेगा। सुप्रीम कोर्ट की निगरानी वाली जांच और रिलायंस इकाइयों के इंसॉल्वेंसी रेजोल्यूशन की प्रगति पर अपडेट, वित्तीय प्रणाली के लिए अंतिम रिकवरी के आंकड़ों पर प्रकाश डालेंगे।
