बढ़ती महंगाई को काबू करने के लिए दुनियाभर के सेंट्रल बैंक लगातार ब्याज दरें बढ़ाने के संकेत दे रहे हैं। इसका सीधा असर बॉन्ड की कीमतों पर पड़ रहा है और मार्केट में भारी वोलैटिलिटी (Volatility) देखी जा रही है। फिक्स्ड-इनकम एसेट रखने वाले निवेशकों, खासकर लॉन्ग-ड्यूरेशन वाले निवेशकों को अब काफी सावधानी बरतने की जरूरत है।
ग्लोबल फाइनेंशियल मार्केट इस वक्त एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। सेंट्रल बैंकों के सख्त रुख के कारण डेट निवेशकों के लिए चुनौतियां बढ़ गई हैं। जैसे-जैसे ब्याज दरें ऊपर जा रही हैं, पुरानी बॉन्ड्स की वैल्यू गिर रही है क्योंकि नई बॉन्ड्स अब ज्यादा रिटर्न (Yields) ऑफर कर रही हैं। यह बॉन्ड मार्केट का एक बुनियादी नियम है जिसे निवेशक अभी लाइव देख रहे हैं।
ड्यूरेशन रिस्क (Duration Risk) को समझें
जो निवेशक लंबी अवधि (Long-duration) वाले बॉन्ड्स में निवेश किए हुए हैं, उन पर सबसे ज्यादा दबाव है। ये बॉन्ड्स ब्याज दरों के प्रति बेहद संवेदनशील होते हैं। अगर आप अपने पोर्टफोलियो में उतार-चढ़ाव देख रहे हैं, तो समझ लीजिए कि यह मार्केट के मौजूदा साइकिल का एक हिस्सा है।
इस समय क्या है सही रणनीति?
इस तरह के माहौल में बार-बार ट्रेड करने से नुकसान हो सकता है। सबसे बेहतर तरीका है 'Buy-and-Hold' रणनीति को अपनाना। जब आप बॉन्ड को उसकी मैच्योरिटी (Maturity) तक होल्ड करते हैं, तो आपको मिलने वाला फिक्स्ड इंटरेस्ट और प्रिंसिपल अमाउंट सुरक्षित रहता है, जिससे आप शॉर्ट-टर्म मार्केट झटकों से बच सकते हैं।
क्रेडिट क्वालिटी और मैक्रो रिस्क
सिर्फ ब्याज दरें ही नहीं, बल्कि बढ़ती लागत और एनर्जी क्राइसिस का असर कंपनियों की बैलेंस शीट पर भी पड़ रहा है। अधिक ब्याज दरें हर कंपनी के लिए बोझ सहना आसान नहीं होता। इसलिए, ज्यादा रिटर्न के चक्कर में खराब क्रेडिट क्वालिटी वाले बॉन्ड्स में न फंसे।
आने वाले समय में, सेंट्रल बैंक की मीटिंग्स और महंगाई के डेटा पर अपनी नजरें जमाए रखें। अपनी होल्डिंग्स को अपने फाइनेंशियल गोल्स और समय सीमा के अनुसार अलाइन करना ही इस कठिन दौर में आपकी सबसे बड़ी सुरक्षा है।
