बिहार में माइक्रोफाइनेंस की रिकवरी: बड़े कर्ज़ बने सहारा, पर जोखिम अभी बाकी
बिहार का माइक्रोफाइनेंस सेक्टर मार्च तिमाही (Q4FY26) में 8.9% की मजबूत ग्रोथ के साथ पटरी पर लौटता दिखा है। इस दौरान सेक्टर का कुल लोन पोर्टफोलियो बढ़कर ₹53,100 करोड़ हो गया। यह रिकवरी ऐसे समय में आई है जब देश का पूरा माइक्रोफाइनेंस सेक्टर भी 2024-2025 में आई बड़ी मुश्किलों से उबर रहा है। हालांकि, इस ग्रोथ की वजहें और भविष्य के रास्ते अभी भी थोड़े अनिश्चित हैं।
कर्ज़ का साइज़ बढ़ा, NPA घटे: क्या यह अच्छी खबर है?
बिहार में माइक्रोफाइनेंस सेक्टर के रिवाइवल (Revival) की मुख्य वजह अब बड़े लोन साइज का बढ़ना है। इस तिमाही में ₹50,000 से ₹80,000 के बीच के लोन, कुल डिस्बर्सल (Disbursal) का 45.2% रहे। इसी के साथ, सेक्टर की एसेट क्वालिटी (Asset Quality) में भी सुधार हुआ है, जहां 31-180 दिनों के पुराने NPA (Non-Performing Assets) घटकर मात्र 2% पर आ गए हैं। यह आंकड़े बिहार को राष्ट्रीय औसत के करीब ले आए हैं, जो 2024-2025 में डिफॉल्ट (Default) के मामले में एक चिंता का केंद्र बना हुआ था। अगर पूरे देश की बात करें तो माइक्रोफाइनेंस इंडस्ट्री का ग्रॉस लोन पोर्टफोलियो (GLP) मार्च 2026 तक 3.2% बढ़कर ₹3.31 लाख करोड़ तक पहुँच गया, हालांकि यह पिछले साल के मुकाबले 13% कम है, जो इंडस्ट्री की धीमी रिकवरी को दिखाता है।
भारतीय माइक्रोफाइनेंस इंडस्ट्री में ठहराव, पर डिफॉल्ट का खतरा कायम
बिहार की यह रिकवरी तब हो रही है जब पूरा भारतीय माइक्रोफाइनेंस सेक्टर भी स्थिरता दिखा रहा है। मार्च 2026 तक, कुल GLP में 3.2% की सीक्वेंशियल (Sequential) बढ़ोतरी हुई, जो आठ तिमाहियों की गिरावट के बाद एक सकारात्मक संकेत है। इस रिवाइवल को नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी-माइक्रो फाइनेंस इंस्टीट्यूट (NBFC-MFIs) लीड कर रहे हैं, जिनकी मार्केट हिस्सेदारी मार्च 2026 तक बढ़कर 43.7% हो गई, जो पिछले साल 38.9% थी। वहीं, बैंकों की हिस्सेदारी घटकर 26.4% रह गई।
इसके बावजूद, सेक्टर में डिफॉल्ट (Default) की दरें चिंताजनक बनी हुई हैं। पूरे देश में 30+ दिनों से ज्यादा पुराने NPA (PAR 30+) की दर FY2024-25 में बढ़कर 6.2% हो गई, जो पिछले साल 2.1% थी। 90+ दिनों से ज्यादा पुराने NPA (PAR 90+) भी 1.6% से बढ़कर 4.8% हो गए। मार्च 2025 में, बिहार में 7.2% लोन 30+ दिनों से अधिक पुराने और 4.6% लोन 90+ दिनों से अधिक पुराने थे, जो उस समय राष्ट्रीय औसत से ज़्यादा थे। देश भर में औसत लोन साइज भी बढ़कर लगभग ₹61,500 हो गया है, जो बड़े लोन की ओर बढ़ते ट्रेंड को दिखाता है।
माइक्रोफाइनेंस के भविष्य पर लगातार बने जोखिम
इन सकारात्मक ग्रोथ नंबर्स के बावजूद, बिहार के माइक्रोफाइनेंस सेक्टर की स्थिरता पर कई बड़े जोखिम मंडरा रहे हैं। राज्य की 2024-2025 में डिफॉल्ट और बरोअर (Borrower) ओवर-इंडेट्नेस (Over-indebtedness) के मामले में 'फ्लैशपॉइंट' (Flashpoint) बनने की पिछली भूमिका पर बारीकी से नज़र रखने की ज़रूरत है। वर्तमान में बड़े लोन पर टिकी ग्रोथ, बरोअर के मौजूदा तनाव को छुपा सकती है या अगर इसे ठीक से मैनेज न किया गया तो ओवर-लिवरेजिंग (Over-leveraging) को बढ़ा सकती है। ग्रामीण बरोअर, जो ऐतिहासिक रूप से अधिक संवेदनशील रहे हैं, उनमें डिफॉल्ट की दरें अभी भी ज़्यादा देखी जा रही हैं।
सेक्टर को बरोअर ओवर-इंडेट्नेस और क्रेडिट रिस्क (Credit Risk) जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। बिहार, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों को डिफॉल्सी के हॉटस्पॉट (Hotspot) के तौर पर पहचाना गया है, जो नए डिफॉल्ट में बड़ा योगदान दे रहे हैं। NBFC-MFIs को 'मिशन ड्रिफ्ट' (Mission Drift) का भी खतरा है, जहां उनका फोकस फाइनेंशियल इन्क्लूज़न (Financial Inclusion) से हटकर प्रॉफिट पर जा सकता है। इसके अलावा, बिहार जैसे राज्यों में माइक्रोफाइनेंस की पैठ (Penetration) लगभग ~80% है, जो मार्केट सैचुरेशन (Market Saturation) के करीब होने का संकेत दे सकती है, जिससे भविष्य में ग्रोथ मुश्किल हो सकती है। अतीत में राजनीतिक हस्तक्षेप और राज्य सरकारों के नियम भी सेक्टर की स्थिरता को प्रभावित कर चुके हैं।
माइक्रोफाइनेंस का भविष्य: अनुमान और उम्मीदें
भारतीय माइक्रोफाइनेंस मार्केट के आने वाले सालों में 9.77% से 11% की कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) से बढ़ने का अनुमान है, और यह 2034 तक USD 17.7 billion तक पहुँच सकता है। आर्थिक सर्वे 2025-26 भी सेक्टर में स्थिरता की ओर इशारा करता है, जिसमें रेगुलेटरी (Regulatory) एडजस्टमेंट और बेहतर एसेट क्वालिटी का सहारा है। क्रेडिट गारंटी स्कीम्स (Credit Guarantee Schemes) जैसी पहल छोटे एंटिटीज़ (Entities) को लिक्विडिटी (Liquidity) की समस्या से निपटने में मदद करेंगी, जिससे इंडस्ट्री की रिकवरी और मज़बूत होगी।
