भारत का **$2 बिलियन** का GCC कंसल्टिंग मार्केट तेजी से बदल रहा है। ग्लोबल कंसल्टिंग दिग्गज अब AI और हाई-वैल्यू सर्विस पर दांव लगा रहे हैं, जो लिस्टेड भारतीय IT कंपनियों के लिए बड़ी प्रतिस्पर्धा खड़ी कर रहा है।
बदलता बिजनेस मॉडल
भारत में ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। कभी ये सिर्फ सपोर्ट और बेसिक ऑपरेशन का केंद्र हुआ करते थे, लेकिन अब ये प्रोडक्ट डेवलपमेंट और AI-ड्रिवेन स्ट्रैटेजी जैसे हाई-वैल्यू कामों के हब बन गए हैं। इस बदलाव का फायदा उठाने के लिए दुनिया की 'Big Four' फर्में—Deloitte, EY, KPMG और PwC—एक बड़ी रेवेन्यू जंग लड़ रही हैं।
IT सेक्टर पर क्या होगा असर?
यह भारतीय IT इन्वेस्टर्स के लिए गौर करने वाली बात है। जहाँ एक तरफ TCS, Infosys और HCLTech का दबदबा रहा है, वहीं अब Big Four अपनी ऑडिट और टैक्स की पकड़ का इस्तेमाल करके टेक्नोलॉजी कंसल्टिंग में घुसपैठ कर रही हैं। यह सीधे तौर पर घरेलू IT कंपनियों के बिजनेस को टक्कर दे रहा है।
रेवेन्यू का बड़ा स्रोत
आंकड़े बताते हैं कि Deloitte India और EY India जैसी फर्मों ने अकेले GCC-संबंधित कंसल्टिंग सेगमेंट से ₹5,000 करोड़ से ज्यादा का रेवेन्यू पार कर लिया है। अब वे स्टाफ हायरिंग मॉडल से आगे बढ़कर लॉन्ग-टर्म स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप और परफॉर्मेंस-लिंक्ड कॉन्ट्रैक्ट्स पर ध्यान दे रही हैं।
बढ़ते रिस्क और चुनौतियां
हालाँकि, GCC प्रोजेक्ट्स में बिलिंग रेट्स सामान्य काम से 30% से 40% तक ज्यादा होते हैं, लेकिन बाजार में भीड़ बढ़ रही है। फिलहाल 160 से अधिक स्पेशलाइज्ड कंपटीटर्स बाजार में हैं, जिससे प्राइसिंग पर दबाव बन रहा है। अगर कंपनियां खुद को अलग साबित नहीं कर पाईं, तो आने वाले समय में इनके प्रॉफिट मार्जिन पर चोट लग सकती है।
2030 तक 5,000 सेंटर्स के लक्ष्य के साथ, बाजार में ग्रोथ और मार्जिन को बैलेंस करना सबसे बड़ी चुनौती होगी।
