भारतीय बैंक अब प्रोजेक्ट फाइनेंस के लिए एक साझा फ्रेमवर्क तैयार कर रहे हैं। इसका मकसद कंसोर्टियम (Consortium) में लोन बांटने के दौरान आने वाली विसंगतियों को दूर करना और रिस्क क्लासिफिकेशन को पारदर्शी बनाना है।
भारत के बैंकिंग सेक्टर में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। बड़े प्रोजेक्ट्स को फंड करने के लिए बैंक अब एक 'कॉमन स्टैंडर्ड' अपना रहे हैं, ताकि किसी भी बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट को इवेलुएट करने में हर बैंक का नजरिया एक जैसा हो। अक्सर देखा गया है कि जब कई बैंक मिलकर किसी प्रोजेक्ट को फंड करते हैं, तो कोई बैंक उसे 'Healthy Asset' मानता है, जबकि दूसरा उसे रिस्की करार देता है। इस विरोधाभास से ऑडिट और रेगुलेटरी रिपोर्टिंग में काफी उलझनें पैदा होती हैं।
क्या बदलेगा?
बैंक अब प्रोजेक्ट की कुल लागत (Total Capital Outlay), फंडिंग की मात्रा और 'जेस्टेशन पीरियड' (काम शुरू होने के बाद आय आने में लगने वाला समय) जैसे पैरामीटर्स पर एक समान नीति बनाने पर चर्चा कर रहे हैं। यह कदम रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के दिशानिर्देशों का उल्लंघन नहीं है, बल्कि बैंकों के बीच आपसी तालमेल बढ़ाकर पारदर्शिता लाने की एक कोशिश है।
निवेशकों के लिए क्यों है जरूरी?
प्रोजेक्ट फाइनेंस में भारी-भरकम राशि दांव पर लगी होती है। अक्टूबर 2025 से लागू RBI नियमों के अनुसार, अंडर-कंस्ट्रक्शन जनरल प्रोजेक्ट्स के लिए 1% और कमर्शियल रियल एस्टेट के लिए 1.25% का स्टैंडर्ड एसेट प्रोविजनिंग अनिवार्य है। यदि बैंक अपनी इंटरनल पॉलिसीज को कॉमन स्टैंडर्ड के साथ अलाइन करते हैं, तो बैलेंस शीट में दिख रही असमानता कम होगी।
हालांकि, इस सख्ती से अंडरराइटिंग पर भी असर पड़ सकता है। जो प्रोजेक्ट पहले ढीले मानकों के कारण फंड पा जाते थे, वे अब कड़ी जांच के दायरे में होंगे। निवेशकों को अब यह देखना होगा कि यह नया स्टैंडर्ड लोन अप्रूवल की रफ्तार और बैंकिंग सेक्टर की एसेट क्वालिटी को किस तरह प्रभावित करता है।
