भारतीय बैंकों का बड़ा दांव: अब सिर्फ 'अमीर' ग्राहकों को ही मिलेंगे पर्सनल लोन, जानिए क्या है नई रणनीति

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
भारतीय बैंकों का बड़ा दांव: अब सिर्फ 'अमीर' ग्राहकों को ही मिलेंगे पर्सनल लोन, जानिए क्या है नई रणनीति
Overview

भारतीय बैंकों में पर्सनल लोन (Personal Loan) लेने वालों के प्रोफाइल में बड़ा बदलाव देखा जा रहा है। अब अमीर और 'मास-एफ्लुएंट' (Mass-Affluent) सेगमेंट के लोग ज़्यादा लोन ले रहे हैं। इसकी वजह है इंस्टेंट डिजिटल अप्रूवल (Instant Digital Approval) की सुविधा और अपनी लंबी अवधि की सेविंग्स (Long-term Investments) को बचाए रखने की चाहत। इस ट्रेंड को देखते हुए बैंक भी अपनी रणनीति बदल रहे हैं और ज़्यादा वैल्यू वाले क्लाइंट्स को टारगेट कर रहे हैं।

अमीरों पर दांव, जोखिम कम करने की राह

भारतीय बैंकिंग सेक्टर में पर्सनल लोन (Personal Loan) लेने वालों के प्रोफाइल में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। अब सिर्फ बड़े शहरों या पारंपरिक ग्राहक वर्ग ही नहीं, बल्कि 'मास-एफ्लुएंट' (Mass-Affluent) और एफ्लुएंट (Affluent) यानी अमीर ग्राहक बड़ी संख्या में पर्सनल लोन ले रहे हैं। यह सिर्फ एक ट्रेंड नहीं, बल्कि बदलती हुई कंज्यूमर बिहेवियर का नतीजा है। लोग अब इंस्टेंट क्रेडिट (Instant Credit) की सुविधा को महत्व दे रहे हैं और अपनी लिक्विड सेविंग्स (Liquid Savings) को लंबी अवधि के निवेश (Long-term Investments) से अलग रखना चाहते हैं। इसके जवाब में, बैंक भी अपनी रणनीति में बदलाव कर रहे हैं। वे छोटे और ज़्यादा जोखिम वाले लोन सेगमेंट के लिए अंडरराइटिंग (Underwriting) को थोड़ा सख्त कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर, हाई-वैल्यू अनसिक्योर्ड क्रेडिट (High-value Unsecured Credit) के लिए आक्रामक तरीके से आगे बढ़ रहे हैं।

'सोलिटेयर' प्रोग्राम: अमीर ग्राहकों के लिए प्रीमियम लोन

बैंक खास तौर पर हाई-नेट-वर्थ इंडिविजुअल्स (High-Net-Worth Individuals) यानी ज्यादा संपत्ति वाले लोगों को पर्सनल लोन के लिए टारगेट कर रहे हैं। इसकी वजह यह है कि ये ग्राहक ज़्यादा बड़ी रकम उधार ले सकते हैं और समय पर चुकाने की क्षमता भी रखते हैं। उदाहरण के लिए, कोटक महिंद्रा बैंक (Kotak Mahindra Bank) ने अपना 'सोलिटेयर' (Solitaire) प्रोग्राम लॉन्च किया है, जो खास तौर पर उन अमीर ग्राहकों के लिए है जिनका रिलेशनशिप वैल्यू (Relationship Value) ₹75 लाख से लेकर ₹8 करोड़ तक है। हालांकि, यह सेगमेंट बैंक के कुल ग्राहकों का 1% से भी कम है, लेकिन यह बैंक के बिजनेस का एक तिहाई से ज़्यादा हिस्सा है। कोटक महिंद्रा बैंक इस एफ्लुएंट मार्केट का एक बड़ा हिस्सा अपने नाम करना चाहता है, जहाँ फिलहाल उसका अनुमानित शेयर 4% है। इन प्रीमियम ग्राहकों के लिए ₹8 करोड़ तक की प्री-अप्रूव्ड क्रेडिट लाइन्स (Pre-approved Credit Lines) और खास तौर पर डिजाइन किए गए लोन जैसे एक्सक्लूसिव ऑफर शामिल हैं। अनसिक्योर्ड लोन (Unsecured Loans) से मिलने वाले ज़्यादा यील्ड (Yield) को देखते हुए, यह एफ्लुएंट सेगमेंट पर फोकस मार्जिन प्रेशर (Margin Pressure) को कम करने में भी मदद करता है।

टेक्नोलॉजी का जादू: 10-15 सेकंड में लोन अप्रूवल

पर्सनल लोन का तेजी से और मिनटों में डिस्पर्सल (Disbursement) ग्राहकों, खासकर एफ्लुएंट ग्राहकों के लिए एक बड़ा आकर्षण है। यह स्पीड एडवांस्ड एप्लीकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस (APIs) की मदद से संभव हो पा रहा है, जो सीधे लेंडिंग सिस्टम्स को क्रेडिट ब्यूरो (Credit Bureaus) से जोड़ते हैं। ये APIs क्रेडिट रिपोर्ट (Credit Reports) और स्कोर (Scores) को लगभग तुरंत प्राप्त करने की सुविधा देते हैं, जिससे ऑटोमेटेड अंडरराइटिंग (Automated Underwriting) और डिसीजन-मेकिंग (Decision-making) आसान हो जाती है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, पूरा लोन एप्लीकेशन और अप्रूवल प्रोसेस मात्र 10-15 सेकंड में पूरा हो सकता है। टेक्नोलॉजी का यह इंटीग्रेशन ग्राहक को ऑनबोर्ड (Onboard) करने की प्रक्रिया को आसान बनाता है, सुविधा बढ़ाता है और देरी की वजह से ग्राहकों के एप्लीकेशन छोड़ने की संभावना को काफी कम करता है। ट्रांसयूनियन सिबिल (TransUnion CIBIL) जैसे क्रेडिट ब्यूरो रियल-टाइम में क्रेडिट हिस्ट्री (Credit Histories) का एक्सेस देते हैं, जिससे लेंडर्स को तेज और बेहतर निर्णय लेने में मदद मिलती है।

रेगुलेटरी मोर्चे पर बदलाव और जोखिम प्रबंधन

भारतीय बैंकिंग सेक्टर का अनसिक्योर्ड लेंडिंग (Unsecured Lending) के प्रति नजरिया रेगुलेटरी (Regulatory) दखल के बाद और भी ज़्यादा बारीकी वाला हो गया है। नवंबर 2023 में, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने कंज्यूमर क्रेडिट (Consumer Credit) पर रिस्क वेट्स (Risk Weights) को बढ़ा दिया था ताकि अनसिक्योर्ड लोन में बढ़ती हुई ग्रोथ से जुड़े जोखिमों को कम किया जा सके। इसके चलते कई बैंकों ने अंडरराइटिंग स्टैंडर्ड्स (Underwriting Standards) को सख्त कर दिया, और मौजूदा ग्राहक संबंधों (Existing Customer Relationships) व क्रेडिट योग्यता (Creditworthiness) पर ज़्यादा जोर दिया जाने लगा। नतीजतन, ग्रॉस बैंक क्रेडिट (Gross Bank Credit) में अनसिक्योर्ड एडवांसेज (Unsecured Advances) का शेयर मार्च 2025 तक गिरकर 24.5% पर आ गया। इस सख्ती के बावजूद, पर्सनल लोन मार्केट में ग्रोथ की उम्मीद है, जहाँ लेंडर्स चुनिंदा तौर पर प्रीमियम, लो-रिस्क वाले ग्राहकों को टारगेट कर रहे हैं। भले ही प्राइवेट सेक्टर बैंकों में अनसिक्योर्ड रिटेल लोन (Unsecured Retail Loans) में स्लिपेज (Slippages) का अनुपात ज़्यादा रहा है, लेकिन वे अब प्राइम-एंड-अबव (Prime-and-Above) बॉरोअर्स पर फोकस करके अपनी रणनीति में बदलाव कर रहे हैं। फरवरी 2026 में प्राइम बॉरोअर्स के लिए औसत पर्सनल लोन इंटरेस्ट रेट (Interest Rates) आम तौर पर 13% से 15% के बीच है, जबकि HDFC और ICICI जैसे बैंक 9.99% से शुरू होने वाली दरें दे रहे हैं, और कोटक महिंद्रा बैंक 10.99% से ऑफर कर रहा है।

आगे का रास्ता: अनसिक्योर्ड लोन के रिस्क पर क्या है नज़रिया?

एफ्लुएंट बॉरोअर्स पर स्ट्रैटेजिक फोकस और टेक्नोलॉजी में तरक्की के बावजूद, अनसिक्योर्ड लेंडिंग सेगमेंट में रिस्क (Risks) बने हुए हैं। भले ही कुल NPA (Non-Performing Assets) 12 साल के निचले स्तर पर आ गए हैं, लेकिन रिटेल लोन की क्वालिटी को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं। अनसिक्योर्ड लेंडिंग, रिटेल पोर्टफोलियो में नए NPA का एक बड़ा हिस्सा बन रहा है। अनसिक्योर्ड रिटेल सेगमेंट में ग्रॉस नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (Gross Non-Performing Assets) सितंबर 2025 तक बढ़कर 107 बेसिस पॉइंट्स हो गए थे। प्राइवेट सेक्टर के बैंक, जो अनसिक्योर्ड रिटेल लोन में स्लिपेज का एक बड़ा हिस्सा रखते हैं, खास तौर पर जांच के दायरे में हैं। रिस्क का यह बढ़ता हुआ प्रोफाइल, भले ही बैंक इंस्टेंट लोन टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर रहे हों, फिर भी पुख्ता निगरानी (Robust Monitoring) की मांग करता है। डिजिटल अंडरराइटिंग जितनी तेज़ और कुशल है, उतनी ही यह अंतर्निहित क्रेडिट कमजोरियों (Underlying Credit Weaknesses) को छिपा भी सकती है, अगर इसे सख्ती से मैनेज न किया जाए। ज़्यादा यील्ड वाले अनसिक्योर्ड प्रोडक्ट्स पर फोकस, मार्जिन के लिए भले ही फायदेमंद हो, लेकिन यह बैंकों को क्रेडिट की ज़्यादा अस्थिरता (Credit Volatility) के प्रति उजागर करता है, खासकर आर्थिक मंदी के दौरान। ज़्यादा कैपिटल एलोकेशन (Capital Allocation) और सख्त अंडरराइटिंग के लिए रेगुलेटरी दबाव बफर (Buffers) बनाने के उद्देश्य से है, लेकिन अगर डिफॉल्क्वेंसीज़ (Delinquencies) में लगातार बढ़ोतरी होती है, तो यह उन लेंडर्स की एसेट क्वालिटी (Asset Quality) पर भारी पड़ सकता है जो इस सेगमेंट में ज़्यादा एक्सपोज्ड हैं।

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