अक्टूबर 2026 में भारतीय बैंकों ने रिटेल डिपॉजिट रेट्स बढ़ाने के बजाय शॉर्ट-टर्म होलसेल फंड्स का रास्ता अपनाया है। बैंकों ने कुल **₹19,905 करोड़** के सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट (CDs) जारी किए हैं, ताकि लिक्विडिटी की जरूरतों को लचीले तरीके से पूरा किया जा सके।
अक्टूबर 2026 में बैंकों की रणनीति साफ है—रिटेल डिपॉजिट्स की महंगी ब्याज दरों में उलझने के बजाय, वे होलसेल फंडिंग मार्केट का रुख कर रहे हैं। इस बदलाव के पीछे का मुख्य उद्देश्य अपनी शॉर्ट-टर्म लिक्विडिटी को मैनेज करना है, जिससे वे बिना लंबी अवधि के ब्याज बोझ के अपना काम चला सकें।\n\n### आंकड़ों में समझें खेल\n\nमार्केट के डेटा के अनुसार, अक्टूबर में बैंकों ने ₹98,195 करोड़ के नए CD जारी किए, जबकि ₹78,290 करोड़ के पुराने इंस्ट्रूमेंट्स मैच्योर हुए। इसका मतलब है कि सिस्टम में ₹19,905 करोड़ की नई लिक्विडिटी को CD के जरिए जुटाया गया है। चिंता की बात यह है कि इस फंडिंग की लागत बढ़ गई है; नई इश्यूअंस की वेटेड एवरेज रेट 6.93% रही है, जो पुराने मैच्योर हुए पेपर्स के मुकाबले 36 बेसिस पॉइंट्स अधिक है।\n\n### RBI के फैसलों का असर\n\nयह कदम Reserve Bank of India (RBI) द्वारा 7 अक्टूबर 2026 को रेपो रेट 25 बेसिस पॉइंट्स बढ़ाकर 5.50% करने के बाद आया है। इसके अलावा, 1 अक्टूबर से लागू नए RBI डिपॉजिट नॉर्म्स ने बैंकों को बल्क डिपॉजिट की प्राइसिंग में अधिक लचीलापन दिया है।\n\n### निवेशकों के लिए क्या है रिस्क?\n\nCDs के जरिए फंड जुटाना महंगा सौदा हो सकता है। फिलहाल एक साल के CD रेट रेपो रेट के मुकाबले लगभग 250 बेसिस पॉइंट्स के प्रीमियम पर ट्रेड कर रहे हैं। निवेशकों के लिए यह एक संकेत है: यदि बैंक लगातार रिटेल बेस को मजबूत करने के बजाय महंगे होलसेल फंड्स पर निर्भर रहेंगे, तो आने वाली तिमाहियों में उनके नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) पर दबाव बढ़ सकता है। आगे की तिमाही नतीजों में यह देखना जरूरी होगा कि बैंक अपनी फंडिंग कॉस्ट और एसेट-लायबिलिटी मैनेजमेंट को कैसे संतुलित करते हैं।
