देश के बैंक इस समय एक बड़ी दुविधा में हैं। वे चाहते हैं कि नॉन-रेसिडेंट इंडियंस (NRIs) अपने मौजूदा फॉरेन करेंसी नॉन-रेजिडेंट (FCNR) डिपॉजिट्स को तोड़कर, उन्हें नए और आकर्षक ब्याज दरों पर दोबारा से बुक कर सकें। इसके लिए बैंकों ने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) से खास इजाजत मांगी है।
आखिर क्यों है ये माथापच्ची?
दरअसल, RBI ने एक खास स्कीम लॉन्च की है, जिसके तहत NRIs को पुराने डिपॉजिट्स के मुकाबले करीब दोगुना तक ज्यादा रिटर्न मिल रहा है। नए डिपॉजिट्स पर बैंक 6% से 7.1% तक का ब्याज दे रहे हैं, जबकि पुराने अकाउंट्स में यह दरें 3.35% से 4% के बीच फंसी हुई हैं। ऐसे में, पुराने रेट्स पर जमे हुए ग्राहकों को खोने का डर बैंकों को सता रहा है।
बैंक क्यों उठा रहे हैं ये कदम?
बैंकों के लिए NRI डिपॉजिट्स विदेशी मुद्रा का एक बड़ा और स्थिर स्रोत हैं। अगर ये ग्राहक पैसा निकाल लेते हैं, तो न केवल बैंकों का फॉरेन करेंसी पूल घटेगा, बल्कि हाई-नेट-वर्थ वाले NRI ग्राहकों के साथ उनके पुराने रिश्ते भी खराब हो सकते हैं। अनुमान है कि अगर RBI ने राहत न दी, तो बैंकों को लगभग 1 अरब डॉलर तक के आउटफ्लो का सामना करना पड़ सकता है। बैंक ग्राहकों को खोना नहीं चाहते, लेकिन RBI के नियमों का पालन भी करना है।
RBI के लिए क्या है चुनौती?
RBI के सामने एक बड़ा रेगुलेटरी चैलेंज है। उनकी नीतियां देश में नया विदेशी फंड लाने के लिए हैं, न कि मौजूदा फंड को ही ज्यादा कीमत पर रिन्यू करने के लिए। अगर RBI इजाजत देता है, तो यह एक अतिरिक्त बोझ बन सकता है, क्योंकि अभी वह स्कीम के तहत हेजिंग कॉस्ट (Hedging Cost) खुद वहन कर रहा है। बैंकों को यह भी देखना होगा कि कहीं इस फैसले से जमा राशि की स्थिरता पर कोई बुरा असर न पड़े।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
निवेशकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण यह देखना होगा कि RBI इस मामले पर क्या फैसला लेता है। अगर RBI बैंकों के पक्ष में फैसला सुनाता है, तो बैंकों को अपने NRI डिपॉजिट बेस को बनाए रखने में मदद मिलेगी। लेकिन अगर RBI अपने नियमों पर अड़ा रहता है, तो NRIs से पैसे के इनफ्लो (Inflow) या बैंकों द्वारा अपने NRI ग्राहकों को संभालने के तरीकों पर नजर रखनी होगी। साथ ही, आने वाले तिमाही नतीजों में फॉरेन करेंसी डिपॉजिट्स के कुल इनफ्लो को ट्रैक करना भी जरूरी होगा।
