भारतीय बैंकों ने इमरजेंसी क्रेडिट लाइन गारंटी स्कीम (ECLGS) 5.0 के तहत फाइनेंशियल ईयर 2027 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में **₹60,000 करोड़** से ज़्यादा की राशि मंज़ूर की है। यह क्रेडिट सपोर्ट खास तौर पर MSMEs और उन सेक्टर्स के लिए है जो भू-राजनीतिक तनावों का सामना कर रहे हैं।
Detailed Coverage
ECLGS 5.0: क्यों है ख़ास?
यह स्कीम मई 2026 में शुरू हुई थी और इसका मकसद उन बिज़नेस को लिक्विडिटी सपोर्ट देना है जो डिमांड में उतार-चढ़ाव और सप्लाई चेन की चुनौतियों से जूझ रहे हैं। ये दिक्कतें मौजूदा ग्लोबल भू-राजनीतिक तनावों के चलते पैदा हुई हैं।
पब्लिक और प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी
सरकारी बैंकों में, पंजाब नेशनल बैंक (PNB) सबसे आगे रहा, जिसने ₹12,345 करोड़ से ज़्यादा का सेंक्शन किया। PNB के मैनेजमेंट के मुताबिक, बैंक को करीब 20,000 एप्लीकेशन मिलीं, जो उनके ग्राहकों की मज़बूत मांग को दिखाती हैं। वहीं, केनरा बैंक ने भी ₹7,000 करोड़ के करीब सेंक्शन किए, जो 68,000 एप्लीकेशन्स पर आधारित थे।
प्राइवेट बैंकों ने भी अच्छी भागीदारी दिखाई है। HDFC बैंक ने इस तिमाही में ₹14,000 करोड़ के सेंक्शन के साथ प्राइवेट सेक्टर में लीड किया। इसके बाद एक्सिस बैंक ₹10,000 करोड़ और कोटक महिंद्रा बैंक ₹3,000 करोड़ के साथ रहे।
सेक्टर पर फोकस और इकोनॉमिक असर
यह स्कीम मुख्य रूप से माइक्रो, स्मॉल और मीडियम एंटरप्राइजेज (MSMEs) को सपोर्ट करती है, जो रॉ मटेरियल की कीमतों और एक्सपोर्ट डिमांड में बदलावों के प्रति ज़्यादा संवेदनशील होते हैं। MSMEs के अलावा, यह प्रोग्राम लॉजिस्टिक्स, मैन्युफैक्चरिंग और एविएशन जैसे सेक्टर्स को राहत देने के लिए भी तैयार किया गया है। सरकार की गारंटी की वजह से, बैंकों को कम जोखिम पर क्रेडिट देने में मदद मिलती है, जिससे अनिश्चितता के समय में बिज़नेस को फंड की ज़रूरतें पूरी करने में आसानी होती है।
मध्यम आकार के बैंकों का भी इसमें अहम योगदान रहा। इंडियन बैंक ने ₹5,000 करोड़, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया ने ₹4,500 करोड़, और इंडियन ओवरसीज बैंक ने ₹2,600 करोड़ मंज़ूर किए। वहीं, फेडरल बैंक, आरबीएल बैंक (RBL Bank) और करूर वैश्य बैंक जैसे छोटे बैंकों ने मिलकर ₹2,275 करोड़ का योगदान दिया।
क्रेडिट क्वालिटी और मांग पर नज़र
निवेशकों के लिए, आगे चलकर इन पोर्टफोलियो की एसेट क्वालिटी पर नज़र रखना ज़रूरी होगा। हालांकि सरकारी गारंटी बैंकों के क्रेडिट रिस्क को कम करती है, लेकिन इन क्रेडिट फैसिलिटीज़ के मैच्योर होने के बाद बरोअर्स की रिपेमेंट कैपेसिटी का लॉन्ग-टर्म असर बैंक की बैलेंस शीट पर दिखेगा। निवेशक आने वाले तिमाही नतीजों में इन लोन की प्रगति पर नज़र रख सकते हैं।
