माइक्रोफाइनांस मार्केट में बड़ा बदलाव आया है। जहां बैंक अपने हाथ खींच रहे हैं और उनकी हिस्सेदारी घटकर **21.8%** रह गई है, वहीं स्पेशलिस्ट NBFC-MFIs ने बाजार पर कब्जा जमाते हुए **44.7%** हिस्सेदारी हासिल कर ली है।
भारतीय माइक्रोफाइनांस सेक्टर इस वक्त बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। पारंपरिक बैंक अब सीधे माइक्रो-लेंडिंग से पीछे हट रहे हैं, जिससे स्पेशलाइज्ड NBFC-MFIs को मार्केट में अपनी पैठ बढ़ाने का मौका मिला है। सितंबर 2026 तक के आंकड़ों पर नजर डालें, तो NBFC-MFIs का मार्केट शेयर बढ़कर 44.7% हो गया है, जो एक साल पहले 38.8% था। इसके उलट, बैंकों का माइक्रोफाइनांस पोर्टफोलियो घटकर 21.8% रह गया है, जो इस सेगमेंट में उनके सतर्क रवैये को दर्शाता है।
वॉल्यूम से ज्यादा क्वालिटी पर फोकस
पूरा सेक्टर फिलहाल सावधानी बरत रहा है। सितंबर 2026 तक ग्रॉस लोन पोर्टफोलियो में साल-दर-साल 5% की गिरावट आई है और यह ₹3.28 लाख करोड़ रह गया है। यह गिरावट किसी संकट का संकेत नहीं, बल्कि लेंडर्स की क्रेडिट क्वालिटी सुधारने की एक सोची-समझी रणनीति है।
डेटा बताते हैं कि लोन साइज अब बड़े हो रहे हैं। बीते साल में औसत लोन साइज 17.5% बढ़कर ₹63,100 हो गया है। साथ ही, ₹1 लाख से ज्यादा के लोन में 41.3% का उछाल आया है। ये बड़े लोन पुराने और भरोसेमंद ग्राहकों को दिए जा रहे हैं, जिससे डिफॉल्ट का खतरा कम हुआ है। रिस्क इंडिकेटर्स भी स्थिर हैं, जहां Portfolio-at-Risk (PAR) 0.8% के आसपास बना हुआ है।
रिस्क और चुनौतियां
सेक्टर में स्थिरता दिख रही है, लेकिन चुनौतियां खत्म नहीं हुई हैं। छोटी NBFC-MFIs के लिए फंडिंग का संकट खड़ा हो सकता है, क्योंकि उन्हें आज भी अपनी जरूरतों के लिए बड़े बैंकों पर निर्भर रहना पड़ता है। ताज्जुब की बात यह है कि बैंक खुद सीधे लोन बांटने से बच रहे हैं, लेकिन NBFC-MFIs को फंडिंग के जरिए वे इस सेक्टर से अब भी गहराई से जुड़े हैं।
निवेशकों को ग्रामीण इलाकों की मजदूरी दर, बारिश का पैटर्न और रेगुलेटरी बदलावों पर नजर रखनी चाहिए। भविष्य में मार्जिन इस बात पर निर्भर करेगा कि ये कंपनियां कैसे अपने बैलेंस शीट को संभालती हैं और बैंक से मिलने वाली फंडिंग को कितनी कुशलता से मैनेज करती हैं।
