भारतीय बैंक, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की FCNR(B) विंडो का फायदा उठाते हुए नॉन-रेसिडेंट इंडियंस (NRIs) को अपनी ओर खींच रहे हैं। ये बैंक आकर्षक **16%** तक के रिटर्न का वादा कर रहे हैं, लेकिन इन 'लेवरेज्ड' डिपॉजिट्स में बड़े रिस्क भी छिपे हैं, जैसे भारी जुर्माना और पैसों तक सीमित पहुंच।
Detailed Coverage
लेवरेज्ड डिपॉजिट स्ट्रक्चर को समझें
स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI), IDBI बैंक और HSBC जैसे बड़े बैंक एनआरआई ग्राहकों को लुभाने के लिए एक खास तरह की स्कीम लेकर आए हैं। इसमें ग्राहक अपनी तरफ से कुछ पैसा लगाते हैं और बैंक उसे 9 से 19 गुना तक बढ़ा देता है। इस लेवरेज्ड (Leveraged) स्ट्रक्चर का मकसद 13% से 16% तक का शानदार डॉलर रिटर्न देना है। हालांकि, ये बड़ा रिटर्न उधार लिए गए पैसे से जुड़ा है, जो इसे थोड़ा पेचीदा बना देता है।
अर्ली एग्जिट पर भारी नुकसान का खतरा
ऊंचे रिटर्न का वादा भले ही आकर्षक लगे, लेकिन इन स्कीम्स में फंसे निवेशकों के लिए खतरा बड़ा है। HSBC के डॉक्यूमेंट्स बताते हैं कि अगर कोई निवेशक बीच में ही पैसा निकालना चाहे, तो 4% का भारी जुर्माना लग सकता है। यह जुर्माना कुल डिपॉजिट पर लगता है, न कि सिर्फ आपकी लगाई हुई रकम पर। ऐसे में, समय से पहले निकासी पर आपकी लगाई हुई पूरी रकम डूब सकती है। अगर किसी एनआरआई का स्टेटस बदलकर 'रेसिडेंट' हो जाता है, तो बैंक अपनी गिरवी रखी संपत्तियों को बेचने का भी अधिकार रख सकते हैं।
लिक्विडिटी की समस्या और लोन की शर्तें
SBI और IDBI बैंक जैसी जगहों पर, इन डिपॉजिट्स के लिए लिया गया लोन और डिपॉजिट की मैच्योरिटी एक साथ होती है। इसका मतलब है कि आपका पैसा तब तक लॉक रहेगा जब तक लोन और डिपॉजिट दोनों मैच्योर नहीं हो जाते। निवेशक अपने पैसे को तब तक निकाल नहीं सकते जब तक वे संबंधित लोन को चुका नहीं देते। इससे उनकी वित्तीय सुविधा बहुत सीमित हो जाती है। यह सब विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ाने की कोशिश का हिस्सा है, जिसमें 17 जुलाई तक $20.72 बिलियन का इनफ्लो दर्ज किया गया है। ऐसे में, निवेशकों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि ऊंचे रिटर्न के साथ पूंजी गंवाने का जोखिम कितना है।
