Indian Banks: फंड्स के लिए बैंक चुका रहे 2 साल का सबसे महंगा ब्याज, लिक्विडिटी की भारी किल्लत

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AuthorNeha Patil|Published at:
Indian Banks: फंड्स के लिए बैंक चुका रहे 2 साल का सबसे महंगा ब्याज, लिक्विडिटी की भारी किल्लत
Overview

Indian banks इस समय फंड जुटाने के लिए रिकॉर्ड ब्याज दरें दे रहे हैं। Certificates of Deposit (CDs) पर दरें लगभग **2 साल के उच्चतम स्तर** पर पहुंच गई हैं, जिसका मुख्य कारण फंड्स के लिए ज़बरदस्त कॉम्पिटिशन और लगातार बनी हुई लिक्विडिटी की किल्लत है।

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फंड्स के लिए बैंकों में मची होड़

CSB Bank ने 91-दिन की Certificate of Deposit (CD) के लिए 8.32% की दर की पेशकश की। वहीं, Ujjivan Small Finance Bank और Equitas Small Finance Bank जैसे बैंकों ने भी 8.25% जैसी कॉम्पिटिटिव रेट्स पर फंड्स जुटाए। HDFC Bank और IDBI Bank जैसे बड़े बैंकों ने भी 33-दिन जैसे शॉर्ट-टर्म फंड्स के लिए 7.6% का भुगतान किया।

स्ट्रक्चरल इश्यूज़ से बढ़ी फंड की लागत

हालांकि साल के अंत में कुछ रेट बढ़ना सामान्य है, एक्सपर्ट्स का मानना है कि मौजूदा तेज़ी सिर्फ सीजनल नहीं है। यह दिखाता है कि बैंक कैपिटल जुटाने के लिए बड़े दबाव में हैं। यह स्थिति भारतीय बैंकिंग सिस्टम में गहरे स्ट्रक्चरल इश्यूज़ के कारण है। सिस्टम की लिक्विडिटी में काफी कमी आई है, जो टैक्स के भुगतान और करेंसी मार्केट में RBI के हस्तक्षेप जैसे कारणों से इस साल की शुरुआत में ही डेफिसिट टेरिटरी में चली गई थी। इस लिक्विडिटी क्रंच को क्रेडिट ग्रोथ का डिपॉजिट ग्रोथ से आगे निकल जाना और बढ़ा रहा है। फरवरी 2026 तक, क्रेडिट 13.7% की दर से बढ़ा, जबकि डिपॉजिट 10.9% की दर से बढ़े, जिससे लोन-टू-डिपॉजिट रेशियो 82.5% के हाई लेवल पर पहुंच गया। इसके चलते बैंक महंगे होलसेल फंडिंग सोर्स की ओर रुख कर रहे हैं।

मार्केट पर असर और रिकॉर्ड CD वॉल्यूम

तीन महीने की CD रेट्स और ट्रेजरी बिल्स के बीच का स्प्रेड 210 बेसिस पॉइंट्स तक चौड़ा हो गया है, जो मार्च 2020 के बाद सबसे ज़्यादा है। यह लिक्विडिटी की कमी और बढ़ते फंडिंग रिस्क को दर्शाता है। फरवरी 2026 तक आउटस्टैंडिंग CD वॉल्यूम ₹6.64 ट्रिलियन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गए, जो पिछले दो सालों में 75% की भारी उछाल है।

NIMs पर दबाव और RBI की चुनौती

इन CDs की बढ़ी हुई लागत सीधे बैंकों के नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIMs) को प्रभावित कर रही है। Fitch Ratings का अनुमान है कि अगर फंडिंग कॉस्ट ऊंची बनी रहती है, तो सेक्टर के NIMs उनके FY27 के 3.1% के अनुमान से 20-30 बेसिस पॉइंट्स नीचे गिर सकते हैं। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की लिक्विडिटी इंजेक्ट करने की फ्लेक्सिबिलिटी भी कम हो गई है, जिसका एक कारण ग्लोबल जियो-पॉलिटिकल टेंशन के बीच रुपये को स्थिर रखने के प्रयास हैं। ये कोशिशें भी लिक्विडिटी को कम कर रही हैं और फंड की लागत बढ़ा रही हैं। यह दबाव तब और बढ़ जाता है जब हाउसहोल्ड सेविंग्स बढ़ते हुए म्यूचुअल फंड्स और इक्विटी की ओर जा रही हैं, जिससे स्टेबल, कम-लागत वाली फंडिंग का बेस कम हो रहा है और बैंक होलसेल मार्केट में प्राइस-टेकर बन रहे हैं।

भविष्य का अनुमान

एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि FY27 में CD रेट्स में कोई खास नरमी नहीं आएगी, भले ही हाल की चोटियों से कुछ कमी आ जाए। इसका कारण क्रेडिट-डिपॉजिट मिसमैच जैसे स्ट्रक्चरल इश्यूज़ का बना रहना है। Nomura के एनालिस्ट्स ने सेक्टर में NIM अनुमानों को कम किया है, जिससे रिकवरी में देरी और पहले के अनुमान से कमज़ोर होने का संकेत मिलता है। Moody's Ratings ने डिपॉजिट के लिए बढ़ती कॉम्पिटिशन को एक अहम दबाव बिंदु बताया है, जो अगले साल कुछ लेंडर्स की फंडिंग कॉस्ट बढ़ा सकती है। इस माहौल में बैंकों को महंगी फंडिंग और प्रॉफिटेबिलिटी बनाए रखने के बीच संतुलन साधना होगा।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.