गोल्ड लोन बाजार में बड़ा बदलाव आया है। अगस्त 2026 तक कमर्शियल बैंकों का गोल्ड लोन पोर्टफोलियो बढ़कर **₹5.6 लाख करोड़** हो गया है, जिससे वे NBFCs से काफी आगे निकल गए हैं। कम ब्याज दरों ने बैंकों को ग्राहकों की पहली पसंद बना दिया है, लेकिन कर्जदारों में बढ़ते दबाव के चलते रिस्क भी बढ़ रहा है।
भारत के गोल्ड लोन बाजार में अब बैंकों का एकछत्र राज हो गया है। अगस्त 2026 तक के आंकड़ों के मुताबिक, बैंकों का आउटस्टैंडिंग गोल्ड लोन ₹5.6 लाख करोड़ पर पहुंच गया है, जबकि NBFCs के पास यह आंकड़ा लगभग ₹3.6 लाख करोड़ है। बैंकिंग सेक्टर की इस आक्रामक बढ़त ने रिटेल लेंडिंग के समीकरण पूरी तरह बदल दिए हैं।
बैंकों का पलड़ा भारी क्यों?
बैंकों की इस सफलता के पीछे सबसे बड़ा कारण है फंड की कम लागत (Cost of Funding)। बैंकों के पास विशाल नेटवर्क होने के कारण वे NBFCs की तुलना में कम ब्याज दरों पर लोन दे पा रहे हैं। ग्राहकों के लिए सोने के बदले सस्ती लिक्विडिटी पाना आसान हो गया है, जिससे बैंकों के रिटेल पोर्टफोलियो में तेजी से उछाल आया है।
बढ़ता तनाव और रिस्क
बाजार के विस्तार के साथ ही चुनौतियां भी सामने आई हैं। Bajaj Finance, Shriram Finance और Muthoot Finance जैसे बड़े प्लेयर्स के तिमाही नतीजों में 'स्टेज 2' और 'स्टेज 3' एसेट्स (ओवरड्यू लोन) में बढ़ोतरी देखी गई है। चिंता की बात यह है कि कई कर्जदार गोल्ड लोन का पैसा पर्सनल जरूरतों के बजाय पुराने कर्ज चुकाने में लगा रहे हैं। यह रिटेल बॉरोअर्स के बीच वित्तीय तंगी का संकेत है। सोने की कीमतों में गिरावट या उतार-चढ़ाव आने पर डिफॉल्ट का खतरा और बढ़ सकता है।
RBI की निगरानी
इस तेजी को देखते हुए Reserve Bank of India (RBI) ने गोल्ड लोन सेक्टर के लिए कड़े और एक समान नियम लागू किए हैं। इसमें गोल्ड वैल्यूएशन, LTV (Loan-to-Value) रेशियो और डॉक्यूमेंटेशन स्टैंडर्ड्स को शामिल किया गया है, ताकि ग्राहकों के हितों की रक्षा की जा सके। आने वाले समय में निवेशकों को केवल ग्रोथ पर नहीं, बल्कि एसेट क्वालिटी और रिकवरी रेट्स पर भी नजर रखनी होगी, क्योंकि गोल्ड लोन इंडस्ट्री का अनुमान ₹30 लाख करोड़ तक पहुंचने का है।
