इंडियन बैंकों के लिए एक बड़ा स्ट्रक्चरल बदलाव आ रहा है। ग्राहकों का पैसा पारंपरिक बैंक डिपॉजिट से निकलकर दूसरे निवेशों में जा रहा है, जिससे बैंकों के नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIMs) पर लगातार दबाव बन रहा है। यह सिर्फ एक साइक्लिकल (cyclical) बदलाव नहीं, बल्कि ग्राहकों की बदलती पसंद और मार्केट की नई चाल के चलते हो रहा है। अब बैंकों को महंगे होलसेल फंडिंग (wholesale funding) पर ज्यादा निर्भर रहना पड़ रहा है और सिस्टम से पैसे के लगातार निकलने (liquidity leaks) की वजह से उन्हें अपने बिजनेस मॉडल पर नए सिरे से सोचना पड़ रहा है।
NIM पर लगातार दबाव
Banks के लिए नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIMs) पर बड़ा दबाव देखने को मिल रहा है। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि कम लागत वाले करंट अकाउंट और सेविंग्स अकाउंट (CASA) डिपॉजिट में कमी आ रही है। मार्च 2022 में जो CASA डिपॉजिट 42% से ऊपर थे, वो अब 2025 के मध्य तक घटकर करीब 36% रह जाने का अनुमान है। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि लोग अब बैंक डिपॉजिट में कम और म्यूचुअल फंड व मार्केट-लिंक्ड इंस्ट्रूमेंट्स में ज्यादा पैसा लगा रहे हैं। इसके चलते, बैंकों को महंगे होलसेल फंडिंग सोर्स जैसे बल्क डिपॉजिट और सर्टिफिकेट्स ऑफ डिपॉजिट (CDs) पर ज्यादा निर्भर रहना पड़ रहा है, जिनकी ब्याज दरें 7.5% से भी ऊपर जा सकती हैं। सस्ते रिटेल फंड की जगह महंगे होलसेल फंड का इस्तेमाल सीधे तौर पर प्रॉफिटेबिलिटी पर असर डाल रहा है और NIMs को कम कर रहा है। एनालिस्ट्स का अनुमान है कि NIMs पर लगातार दबाव के चलते 2026 के फाइनेंशियल ईयर (FY26) में रिटर्न ऑन एसेट्स (RoTA) में 12-15 bps की गिरावट आ सकती है।
सिस्टम से लगातार निकल रहा पैसा (Liquidity Leaks)
सिर्फ डिपॉजिट का बाहर जाना ही नहीं, बल्कि कुछ और वजहें भी हैं जिनकी वजह से बैंकिंग सिस्टम से लगातार पैसा बाहर जा रहा है। टैक्स पेमेंट के कारण पैसा आरबीआई (RBI) के पास चला जाता है, जिससे सिस्टम में थोड़ी कमी आ जाती है। 2026 की शुरुआत में, सरकारी कैश बैलेंस ₹1.5 लाख करोड़ से ₹4 लाख करोड़ के बीच रहा है। इसी तरह, फिजिकल कैश निकासी (physical cash withdrawals) में भी भारी बढ़ोतरी हुई है। जनवरी 2026 तक के 14 महीनों में यह ₹4.4 ट्रिलियन तक पहुंच गई है, जो बैंकिंग सिस्टम में दोबारा पैदा नहीं की जा सकती। इसके अलावा, करेंसी की वोलैटिलिटी (volatility) को मैनेज करने के लिए आरबीआई (RBI) जब डॉलर बेचता है, तो वह भारतीय रुपये को सोख लेता है, जिससे लिक्विडिटी स्थायी रूप से कम हो जाती है। इन सभी वजहों से, दिसंबर 2025 तक क्रेडिट-टू-डिपॉजिट रेशियो 82% के उच्च स्तर पर पहुंच गया है, जो आरबीआई (RBI) द्वारा लिक्विडिटी बढ़ाने के उपायों के बावजूद सिस्टम में लगातार लिक्विडिटी दबाव का संकेत देता है।
क्या पैसा वापस आएगा?
यह तर्क कि दूसरे निवेशों में गया पैसा घूम-फिर कर वापस बैंकों में आ जाएगा, अब कमजोर पड़ता दिख रहा है। भले ही कुछ पैसा वापस आए, लेकिन एक बड़ा हिस्सा या तो स्थायी रूप से निकल जाता है या फिर काफी महंगी दर पर लौटता है। बैंक सस्ते रिटेल डिपॉजिट खो रहे हैं और उनकी जगह महंगे होलसेल फंडिंग ले रहे हैं, जिससे सीधे तौर पर NIMs कम हो रहे हैं। यह बदलाव स्थिर घरेलू बचत से हटकर, ज्यादा इंटरेस्ट-रेट-सेंसिटिव और वोलैटाइल कॉर्पोरेट डिपॉजिट की ओर हो रहा है। इसके लिए सिर्फ आकर्षक डिपॉजिट रेट्स देना काफी नहीं होगा, बल्कि डिपॉजिट्स को बनाए रखने के लिए बेहतर कस्टमर सर्विस और बड़े इंस्टीट्यूशनल अकाउंट्स से जुड़ाव को बढ़ाना जरूरी है।
बढ़ती प्रतिस्पर्धा और पिछला अनुभव
डिपॉजिट्स के लिए प्रतिस्पर्धा और तेज हो गई है। पब्लिक सेक्टर बैंक (PSBs) कुछ सेगमेंट में मजबूत प्रॉफिट ग्रोथ दिखा रहे हैं, लेकिन प्राइवेट बैंक ऐतिहासिक रूप से ऊंचे NIMs बनाए रखते हैं। फरवरी 2026 तक, पी/ई रेश्यो (P/E ratios) में काफी अंतर दिख रहा है। पब्लिक सेक्टर बैंकों में यूनियन बैंक 7.38x पर ट्रेड कर रहा है, जबकि प्राइवेट बैंक कोटक महिंद्रा 22.64x पर। यह अलग-अलग ग्रोथ उम्मीदों को दर्शाता है। ऐतिहासिक रूप से, आर्थिक विस्तार और बढ़ती ब्याज दरों के दौर में डिपॉजिट का ऐसा पलायन देखा गया है, जिससे बैंकों के फंड की लागत पर दबाव पड़ा है। हालांकि, मौजूदा स्थिति घर की बचत के व्यवहार में स्ट्रक्चरल बदलावों से चिह्नित है, जहां वैकल्पिक निवेशों को ज्यादा प्राथमिकता दी जा रही है।
मैनेजमेंट और रेगुलेटरी फोकस
फाइनेंशियल एनालिस्ट्स का कहना है कि भले ही NIMs में गिरावट का दौर अपने निचले स्तर के करीब हो, लेकिन सुधार धीरे-धीरे और असमान रूप से हो सकता है। आरबीआई (RBI) का लिक्विडिटी मैनेजमेंट, जिसमें OMO परचेज (OMO purchases) और लिक्विडिटी एडजस्टमेंट फैसिलिटीज (liquidity adjustment facilities) शामिल हैं, सिस्टम को सपोर्ट करने का लक्ष्य रखता है, लेकिन ये मुख्य रूप से अस्थायी उपाय हैं। 2025 में बड़ी कटौतियों के बाद ब्याज दरों पर सेंट्रल बैंक का रुख, ग्रोथ को सपोर्ट करने और महंगाई व करेंसी की स्थिरता को मैनेज करने के बीच एक नाजुक संतुलन को दर्शाता है। अब फोकस टिकाऊ लिक्विडिटी और डिपॉजिट आउटफ्लो से बढ़ी स्ट्रक्चरल लिक्विडिटी मिसमैच को मैनेज करने पर शिफ्ट हो रहा है।
आगे की राह में चुनौतियां (Bear Case)
इंडियन बैंकिंग सेक्टर स्ट्रक्चरल चुनौतियों का सामना कर रहा है जो इसकी प्रॉफिटेबिलिटी को कमजोर कर सकती हैं। मुख्य समस्या सस्ते रिटेल डिपॉजिट फंड का स्थायी रूप से खत्म होना है, जिसकी जगह महंगी होलसेल फंडिंग ले रही है। यह स्ट्रक्चरल लायबिलिटी मिसमैच फंडिंग की लागत को काफी बढ़ाता है और NIMs को कम करता है। कुछ अनुमानों के मुताबिक, 2026 के फाइनेंशियल ईयर (FY26) में NIMs में 20-25 bps की और गिरावट आ सकती है। कई भारतीय बैंक, जो दूसरे प्रतिस्पर्धियों की तरह जीरो डेट पर नहीं हैं, वे काफी लीवरेज्ड (leveraged) हैं, जिससे वे ब्याज दरों में बढ़ोतरी और लिक्विडिटी की कमी के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं। बल्क और इंस्टीट्यूशनल डिपॉजिट्स पर बढ़ती निर्भरता, जो ज्यादा वोलैटाइल और महंगी हैं, सिस्टमैटिक रिस्क बढ़ाती है। इसके अलावा, डॉलर बिक्री के जरिए लिक्विडिटी सोखने की आरबीआई (RBI) की कार्रवाई और लगातार हो रही फिजिकल कैश निकासी, सिस्टम के उधार देने योग्य संसाधनों से स्थायी नुकसान पहुंचा रही है। दिसंबर 2025 तक 82% तक पहुंचे टाइट क्रेडिट-टू-डिपॉजिट रेश्यो, डिपॉजिट ग्रोथ कमजोर पड़ने पर संभावित लिक्विडिटी दबाव का संकेत देते हैं। मैनेजमेंट को कस्टमर लॉयल्टी बनाए रखने और इन बढ़ी हुई फंडिंग कॉस्ट्स को मैनेज करने के लिए अपने बिजनेस मॉडल्स को सक्रिय रूप से दोबारा तैयार करना होगा, क्योंकि सिर्फ रेट्स मैच करना काफी नहीं होगा।
भविष्य का नज़रिया
एनालिस्ट्स उम्मीद कर रहे हैं कि 2026 के मध्य से बैंकों की प्रॉफिटेबिलिटी में सुधार का एक मोड़ आ सकता है। उम्मीद है कि अर्निंग्स (earnings) में उछाल आएगा और NIMs स्थिर होंगे या सुधरेंगे। अनुमानों के मुताबिक, 2027-28 के फाइनेंशियल ईयर (FY27-28) में लोन ग्रोथ में तेजी और मार्जिन रिकवरी से बैंकिंग सेक्टर के प्रॉफिट्स में 17% का सीएजीआर (CAGR) देखने को मिल सकता है। हालांकि, यह उम्मीदें डिपॉजिट मार्केट में लगातार प्रतिस्पर्धा और बैंकों से हटकर दूसरे निवेशों की ओर हो रहे स्ट्रक्चरल शिफ्ट से थोड़ी प्रभावित हो सकती हैं। आरबीआई (RBI) की मॉनेटरी पॉलिसी, फिस्कल मेजर्स और ग्लोबल इकोनॉमिक कंडीशंस सेक्टर की दिशा तय करती रहेंगी। बैंकों को कस्टमर सर्विस को बेहतर बनाकर और नॉन-कोर सर्विसेज का फायदा उठाकर डिपॉजिट्स को बनाए रखने पर फोकस करना होगा, ताकि वे इस चुनौतीपूर्ण फंडिंग परिदृश्य से निपट सकें।