RBI के नए डेटा नियमों से बदलेगी बैंकिंग की तस्वीर, Fintech पार्टनरशिप्स को नए सिरे से तैयार कर रहे Banks

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
RBI के नए डेटा नियमों से बदलेगी बैंकिंग की तस्वीर, Fintech पार्टनरशिप्स को नए सिरे से तैयार कर रहे Banks

भारतीय Banks और NBFCs अपनी Fintech पार्टनरशिप्स को नए नियमों के दायरे में लाने के लिए तेजी से बदलाव कर रहे हैं। RBI की डेटा गवर्नेंस गाइडलाइन्स और DPDP एक्ट के सख्ती से पालन के कारण अब बैंकों को अपने रिस्क मैनेजमेंट को और मजबूत करना पड़ रहा है, जिसका सीधा असर स्टार्टअप्स की फंडिंग और बैंकों के खर्च पर पड़ेगा।

देश के बैंक और नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियां (NBFCs) अब फिनटेक पार्टनर्स के साथ अपने एग्रीमेंट्स को पूरी तरह से बदल रही हैं। यह बदलाव RBI की सख्त डेटा गवर्नेंस पॉलिसी के कारण हो रहा है, जिसके ड्राफ्ट पर अगस्त 2026 तक फीडबैक की प्रक्रिया जारी थी। अब रेगुलेटरी अनुपालन (Compliance) सिर्फ एक बैक-ऑफिस का काम नहीं, बल्कि बैंक का मुख्य ऑपरेशनल एजेंडा बन गया है।

DPDP एक्ट का दबाव

डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट के लागू होने से डेटा सुरक्षा में किसी भी चूक पर भारी जुर्माना लग सकता है। नए नियमों के मुताबिक, ग्राहक के डेटा की सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी अब फाइनेंशियल संस्थान की है, न कि टेक्नोलॉजी वेंडर की। यही वजह है कि बैंक अब ऐसे एग्रीमेंट्स कर रहे हैं जहां डेटा प्रोसेसिंग और स्टोरेज पर उनका सीधा कंट्रोल रहे। पुराने ढीले-ढाले आउटसोर्सिंग मॉडल्स की जगह अब 'कंप्लायंस-फर्स्ट' एग्रीमेंट्स ले रहे हैं।

शेयरधारकों के लिए क्या है मायने?

शेयरधारकों के लिए इसके दो बड़े असर हो सकते हैं। पहला, पुराने सिस्टम को अपग्रेड करने और थर्ड-पार्टी कंप्लायंस सुनिश्चित करने के लिए बैंकों के ऑपरेटिंग खर्च बढ़ सकते हैं, जिससे शॉर्ट टर्म में मुनाफे पर थोड़ा दबाव दिख सकता है। हालांकि, राहत की बात यह है कि 2026 की शुरुआत में 'डिफ़ॉल्ट लॉस गारंटी' (DLG) नियमों में मिली ढील से बैंकों को बैड-डेब्ट कैलकुलेशन में मदद मिल रही है।

स्टार्टअप फंडिंग और प्रोडक्ट पर असर

फिनटेक स्टार्टअप्स के लिए फंडिंग के पैमाने अब बदल गए हैं। पहले जहां केवल 'यूजर ग्रोथ' देखकर पैसा मिलता था, अब वेंचर कैपिटल और प्राइवेट इक्विटी निवेशक उन्हीं कंपनियों को तरजीह दे रहे हैं जिनका डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत और ऑडिट-रेडी है। इससे छोटे फिनटेक खिलाड़ियों के लिए फंडिंग का संकट पैदा हो सकता है। साथ ही, रेगुलेटर्स अब हाई-यील्ड रिवॉल्विंग क्रेडिट के बजाय 'टर्म लोन' की ओर शिफ्ट होने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं, जो आने वाले समय में बैंकों के नेट इंटरेस्ट मार्जिन को प्रभावित कर सकता है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.