लॉकर बना 'डील' का जरिया, बैंक वसूल रहे 'एक्स्ट्रा'
आजकल बैंक लॉकर को हाई-मार्जिन सेल्स (high-margin sales) को बढ़ाने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। लॉकर रखने में बैंक को ज़्यादा फायदा नहीं होता और इसे मेंटेन करने का खर्च भी आता है। ऐसे में, खासकर बड़े शहरों में जहाँ लॉकर की डिमांड (demand) बहुत ज्यादा है और सप्लाई (supply) कम, बैंक इसका फायदा उठा रहे हैं। वे ग्राहकों को इंश्योरेंस पॉलिसियों या दूसरे निवेशों की ओर धकेल रहे हैं, जिनसे बैंक स्टाफ को अच्छा कमीशन मिलता है और बैंक का फी-बेस्ड इनकम (fee-based income) भी बढ़ता है। बात प्रोडक्ट बेचने की नहीं है, बल्कि लॉकर देने के बदले उन्हें खरीदने के लिए मजबूर करने की है, जो RBI के इरादों के खिलाफ है।
क्यों बढ़ी है लॉकर की डिमांड?
आमदनी बढ़ने और सोना जैसे कीमती सामान को सुरक्षित रखने की चाहत के चलते बैंकों के लॉकर की डिमांड में भारी उछाल आया है। लेकिन सप्लाई उस हिसाब से नहीं बढ़ी है। अनुमान है कि 2030 तक 6 करोड़ लॉकर की जरूरत पड़ सकती है, जबकि फिलहाल सिर्फ करीब 60 लाख ही उपलब्ध हैं। ऐसे में बैंकों के पास मोलभाव करने का अच्छा मौका है। RBI के नियमों के मुताबिक, लॉकर के लिए सिक्योरिटी डिपॉजिट (security deposit) सिर्फ तीन साल के किराए और लॉकर तोड़ने के संभावित चार्ज को कवर करने के लिए ही लिया जाना चाहिए। लेकिन ग्राहकों को अक्सर इंश्योरेंस या दूसरे इन्वेस्टमेंट खरीदने का दबाव झेलना पड़ता है।
प्रॉफिट प्रेशर में फी-बेस्ड इनकम पर जोर
ये ट्रेंड दिखाता है कि कैसे भारतीय बैंक अपने मुख्य लेंडिंग प्रॉफिट (net interest margins - NIMs) पर बढ़ते दबाव को कम करने के लिए फी-बेस्ड इनकम पर ज़्यादा निर्भर हो रहे हैं। कमीशन, ब्रोकरेज और थर्ड-पार्टी प्रोडक्ट बेचकर कमाई, टोटल रेवेन्यू का एक अहम हिस्सा है। इस मामले में प्राइवेट बैंक पब्लिक सेक्टर बैंकों से आगे हैं। जैसे, Kotak Mahindra Bank ने FY2022 से FY2023 के बीच अपनी फी- इनकम में 25% की बढ़ोतरी दर्ज की। हालांकि, रेवेन्यू बढ़ाना अच्छी बात है, लेकिन इसके लिए स्टाफ को आक्रामक तरीके से हाई-कमीशन वाले प्रोडक्ट बेचने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। HDFC Bank, ICICI Bank और Axis Bank जैसे बड़े बैंक भी लॉकर ऑफर करते हैं, लेकिन लॉकर की कमी का इस्तेमाल करके प्रोडक्ट बेचने की समस्या काफी आम है। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि लॉकर के मुकाबले फाइनेंशियल सर्विसेज ज़्यादा प्रॉफिटेबल होती हैं। RBI इस मिस-सेलिंग (mis-selling) को रोकने के लिए नए ड्राफ्ट नियम लेकर आई है, जो फरवरी 2026 में जारी हुए थे। इनसे 1 जुलाई, 2026 से ऐसे मामलों में रिफंड और हर्जाने का प्रावधान होगा और बंडल सेल्स (bundled sales) व थर्ड-पार्टी इंसेंटिव पर रोक लगेगी।
गवर्नेंस और भरोसे पर सवाल
लॉकर एक्सेस के बदले प्रोडक्ट खरीदने के लिए मजबूर करना, सेल्स टारगेट को ग्राहक की जरूरत से ऊपर रखने का जोखिम पैदा करता है। इससे भरोसा कम होता है और हितों का टकराव (conflict of interest) भी होता है, क्योंकि स्टाफ को सर्विस से ज़्यादा सेल्स पर कंपनसेशन (compensation) मिलता है। हाल ही में Kotak Mahindra Bank को पंचकुला म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन से जुड़े फिक्स्ड डिपॉजिट में ₹150-160 करोड़ के अंतर को लेकर जांच का सामना करना पड़ा था। इन सब मुद्दों के साथ, ब्रांच लेवल पर बैंकों के आक्रामक क्रॉस-सेलिंग (cross-selling) के तरीके रेगुलेटरी लक्ष्यों को कमजोर कर सकते हैं। लॉकर अलॉटमेंट में पारदर्शिता की कमी और अनचाहे प्रोडक्ट खरीदने के दबाव से ग्राहकों का शोषण हो सकता है।
आगे क्या: सख़्त नियम और ग्राहक की ताकत
RBI के नए नियम, जो 'रिस्पॉन्सिबल बिज़नेस कंडक्ट' (responsible business conduct) पर आधारित हैं, जल्द ही लागू होने वाले हैं। इससे प्रोडक्ट सेल्स पर बैंकों की कड़ी निगरानी होगी। ये नियम ग्राहक की सहमति, प्रोडक्ट की उपयुक्तता पर ज़ोर देंगे और बंडल सेल्स को बैन करेंगे, जिससे मिस-सेलिंग कम होनी चाहिए। हालांकि, लॉकर की डिमांड और सप्लाई का असंतुलन, साथ ही बैंकों के प्रॉफिट प्रेशर को देखते हुए, बिक्री के लिए कमी का फायदा उठाने की कोशिशें जारी रह सकती हैं। नियम और RBI लोकपाल जैसे प्लेटफॉर्म के ज़रिए ग्राहक अब ज़्यादा ताकतवर हो गए हैं। इन नए नियमों की सफलता RBI के मज़बूत लागू करने पर निर्भर करेगी।