2 अक्टूबर, 2026 से भारतीय बैंक देशव्यापी 'रिस्पॉन्सिबल बॉरोइंग कैंपेन' शुरू करने जा रहे हैं। इसका मकसद रिटेल और डिजिटल लेंडिंग में बढ़ते बैड लोन पर लगाम कसना है, क्योंकि फिनटेक लोन में डेलिंक्वेंसी रेट **6.4%** तक पहुँच गया है।
भारतीय बैंक 2 अक्टूबर, 2026 से एक राष्ट्रव्यापी 'रिस्पॉन्सिबल बॉरोइंग कैंपेन' की शुरुआत कर रहे हैं। क्रेडिट इंफॉर्मेशन कंपनियों के सहयोग से चलाया जा रहा यह अभियान सीधे तौर पर रिटेल और अनसिक्योर्ड लोन सेगमेंट में बढ़ते दबाव का जवाब है। इसका मुख्य उद्देश्य वित्तीय साक्षरता को बढ़ावा देना और विशेष रूप से युवाओं के बीच कर्ज लेने की आदतों को बेहतर बनाना है।
एसेट क्वालिटी क्यों बनी चिंता का विषय?
यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब लेंडर्स नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (NPA) के बढ़ते दबाव का सामना कर रहे हैं। मार्च 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, फिनटेक लेंडर्स द्वारा दिए गए ₹50,000 से कम के पर्सनल लोन में डेलिंक्वेंसी रेट 6.4% पर पहुंच गया है, जबकि पारंपरिक बैंकों के लिए यह दर 4.1% थी। अनसिक्योर्ड क्रेडिट की तेज रफ्तार और युवा उधारकर्ताओं के ओवर-लीवरेजिंग के खतरे को देखते हुए रेगुलेटर्स ने सख्त रुख अपनाया है।
सरकारी दखल और निवेशकों पर असर
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के नेतृत्व में सरकार ने बैंकिंग स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए इस आउटरीच प्रोग्राम को अनिवार्य बनाया है। निवेशकों के लिए 'रिस्पॉन्सिबल बॉरोइंग' की यह शिफ्ट महत्वपूर्ण है। हालांकि, सख्त अंडरराइटिंग स्टैंडर्ड्स के कारण लोन ग्रोथ में थोड़ी सुस्ती आ सकती है, लेकिन इससे बैंकों की लोन बुक की क्वालिटी में सुधार की उम्मीद है। छोटे टिकट वाले अनसिक्योर्ड लोन पर निर्भर रहने वाले बैंकों और NBFCs को अपने रिस्क मॉडल को फिर से तैयार करना होगा।
निवेशकों को किन बातों पर रखना है ध्यान?
आने वाले समय में बाजार की नजर इस बात पर होगी कि यह मुहिम रिटेल क्रेडिट की ग्रोथ को कैसे प्रभावित करती है। निवेशकों को आने वाली तिमाहियों में क्रेडिट कॉस्ट ट्रेंड्स और नेट इंटरेस्ट मार्जिन पर नजर रखनी चाहिए। यदि यह अभियान डेलिंक्वेंसी रेट को कम करने में सफल रहता है, तो लेंडर्स के मुनाफे में स्थिरता आएगी। हालांकि, अगर क्रेडिट डिमांड में बड़ी गिरावट आती है, तो आक्रामक लेंडिंग करने वाली कंपनियों की कमाई पर दबाव पड़ सकता है।
