FY26 में भारतीय कंपनियों ने डिविडेंड के मामले में नया रिकॉर्ड बनाया है। बैंकिंग सेक्टर ने अकेले **₹71,000 करोड़** से ज्यादा का वितरण किया है, हालांकि कुल पे-आउट रेश्यो घटकर **27.6%** रह गया है, जो कंपनियों की विस्तार की रणनीति को दर्शाता है।
वित्त वर्ष 2026 में भारतीय कंपनियों ने डिविडेंड के जरिए अपने शेयरधारकों की झोली जमकर भरी है। इसमें फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस सबसे आगे रहे। 23 बड़े बैंकों ने मिलकर कुल ₹71,858 करोड़ का डिविडेंड दिया। बैंकों के मजबूत बैलेंस शीट और बेहतर एसेट क्वालिटी के कारण वे शेयरधारकों को कैश लौटाने के साथ-साथ क्रेडिट ग्रोथ को भी फंड करने में सक्षम रहे।
बैंकिंग सेक्टर का दबदबा और कॉर्पोरेट ट्रेंड्स
Nifty 500 कंपनियों में HDFC Bank सबसे बड़ा डिविडेंड बांटने वाला बैंक रहा, जिसने पिछले फाइनेंशियल ईयर के मुकाबले 40% की बढ़त के साथ करीब ₹21,000 करोड़ का भुगतान किया। वहीं, State Bank of India ने 13% की वृद्धि के साथ ₹16,015 करोड़ का डिविडेंड दिया। बैंकों के अलावा माइनिंग और ऑयल रिफाइनिंग सेक्टर का योगदान भी शानदार रहा, जिन्होंने क्रमशः ₹34,359 करोड़ और ₹25,163 करोड़ का योगदान दिया।
पे-आउट रेश्यो क्यों घटा?
डिविडेंड की भारी रकम के बावजूद, मार्केट का कुल पे-आउट रेश्यो (नेट प्रॉफिट का वह हिस्सा जो डिविडेंड के रूप में दिया जाता है) पिछले साल के 30.4% से गिरकर 27.6% पर आ गया है। इसका साफ मतलब यह है कि कंपनियों का मुनाफा डिविडेंड की तुलना में कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ा है। कंपनियां अब अपने मुनाफे का बड़ा हिस्सा भविष्य के विस्तार और कैपिटल स्पेंडिंग के लिए बचाकर रख रही हैं।
डिविडेंड यील्ड को कैसे समझें?
रेगुलर इनकम की तलाश कर रहे निवेशकों के लिए स्थिति थोड़ी मिली-जुली है। Nifty 500 की करीब आधी कंपनियों की डिविडेंड यील्ड 1% से भी कम है, और केवल 13 कंपनियां ऐसी हैं जिनकी यील्ड 5% से ऊपर है।
Vedanta जैसी कंपनियों ने 13.2% की शानदार यील्ड के साथ आक्रामक रुख अपनाया है, जबकि HCL Technologies जैसी कंपनियां अपने ऑपरेशंस में ज्यादा कैपिटल रीइन्वेस्ट कर रही हैं। निवेशकों को अब केवल एब्सोल्यूट नंबर नहीं, बल्कि कंपनियों की कैपिटल एलोकेशन स्ट्रैटेजी पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि रिटेंड अर्निंग्स का सीधा असर आने वाले समय में कंपनी की ग्रोथ पर पड़ेगा।
