Banks का जलवा: NBFCs और Bonds को पीछे छोड़ा, FY26 में बने सबसे बड़े लेंडर!

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
Banks का जलवा: NBFCs और Bonds को पीछे छोड़ा, FY26 में बने सबसे बड़े लेंडर!
Overview

FY26 में भारतीय बैंकों ने कमर्शियल सेक्टर को फंडिंग देने में अपनी पुरानी बादशाहत फिर से हासिल कर ली है। बैंकों ने अपना मार्केट शेयर **63%** तक पहुंचा दिया है, जो कि FY25 में **51%** था। इसकी मुख्य वजह बैंकों की तेज़ी से रेट कट ट्रांसफर करने की क्षमता है, जिसने NBFCs और बॉन्ड मार्केट को पीछे छोड़ दिया है।

बैंकों की तेज़ चाल, NBFCs की धीमी रफ़्तार

यह बड़ी वापसी बैंकों की एक खास ताकत को दिखाती है: उनकी डिपॉजिट लेने की क्षमता। इसकी वजह से वे मॉनेटरी इज़िंग (monetary easing) के फायदे नॉन-बैंक कंपनियों की तुलना में कहीं तेज़ी से ग्राहकों तक पहुंचा पाते हैं। भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने फरवरी 2026 से रेपो रेट 5.25% पर स्थिर रखा है, और इस रेट कट का असर सीधे लेंडिंग कॉस्ट पर हुआ है। बैंकों ने फंड्स की कम लागत का फायदा उठाकर ज़्यादा कॉम्पिटिटिव रेट्स ऑफर किए हैं, जो NBFCs और बॉन्ड मार्केट के लिए मुश्किल साबित हुआ है।

नंबर्स क्या कहते हैं?

बैंकों ने अप्रैल-दिसंबर 2025 के दौरान कमर्शियल सेक्टर को फंड करने में 63% की हिस्सेदारी हासिल की, जो FY25 के 51% से काफी ऊपर है। यह उछाल सीधे तौर पर पॉलिसी रेट में कटौती को तेज़ी से लेंडिंग रेट्स में बदलने की बैंक की क्षमता के कारण है। आउटस्टैंडिंग बैंक लोन पर वेटेड एवरेज लेंडिंग रेट (WALR) अप्रैल 2025 से 60 बेसिस पॉइंट्स से ज़्यादा घटा है। यह कटौती टॉप-रेटेड पांच साल के कॉर्पोरेट बॉन्ड यील्ड में आई गिरावट से कहीं ज़्यादा है। बैंकों को यह फायदा अपनी स्टेबल और कम लागत वाली डिपॉजिट्स की वजह से मिला है, जबकि NBFCs को फंड जुटाने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।

NBFCs और बॉन्ड मार्केट पर महंगाई का मार

Non-Banking Financial Companies (NBFCs) के लिए फंड जुटाने की लागत बढ़ गई है, जिस कारण वे फंडिंग का एक बड़ा ज़रिया नहीं रह गए हैं। बॉन्ड मार्केट पर उनकी निर्भरता और वहां बढ़े यील्ड्स के चलते, बैंकों की डिपॉजिट बेस की तुलना में उनके लिए सस्ते फंड्स हासिल करना मुश्किल हो गया है। 10-साल के भारतीय सरकारी बॉन्ड यील्ड में थोड़ी नरमी के बावजूद (फरवरी 2026 के अंत में करीब 6.67%), ये अभी भी ऊंचे हैं। इससे NBFCs की फाइनेंसिंग कॉस्ट बढ़ जाती है और वे अपने ग्राहकों को रेट कट का फायदा कम दे पाते हैं। नतीजतन, कुल फंडिंग में NBFCs का शेयर कम हुआ है। बॉन्ड मार्केट का भी योगदान पहले से कम हुआ है क्योंकि ऊंचे यील्ड्स के कारण कंपनियों के लिए सीधे लोन लेना ज़्यादा आकर्षक हो गया है। FY27 के लिए सरकार के बड़े बरोइंग प्लान ( ₹17.2 ट्रिलियन ) से बॉन्ड यील्ड्स पर और दबाव बढ़ सकता है, जिससे NBFCs के लिए लागत की चुनौतियाँ और बढ़ेंगी।

कॉम्पिटिशन और क्रेडिट ग्रोथ का भविष्य

मौजूदा माहौल बैंकों के पक्ष में है, और उनसे उम्मीद है कि वे कॉर्पोरेट कैपिटल एक्सपेंडिचर की फंडिंग में अपना दबदबा बनाए रखेंगे। एनालिस्ट्स ने बैंक क्रेडिट ग्रोथ के लिए FY26 और FY27 दोनों के लिए करीब 13% का अनुमान लगाया है। यह ग्रोथ 5.25% के स्टेबल रेपो रेट और बैंकों की बढ़ी हुई एफिशिएंसी से समर्थित है। पब्लिक सेक्टर बैंक विशेष रूप से आक्रामक रहे हैं, जिन्होंने दिसंबर 2025 में नए लोन पर लेंडिंग रेट 100 बेसिस पॉइंट्स से ज़्यादा घटाकर औसतन 7.61% कर दिया है, जबकि प्राइवेट बैंकों ने 30 बेसिस पॉइंट्स घटाकर 9.14% किया। यह कॉम्पिटिटिव एजेंड सुनिश्चित करता है कि बैंक बिज़नेस के लिए पसंदीदा फंडिंग सोर्स बने रहें। NBFCs द्वारा बैंकों से बरोइंग में बढ़ोतरी (दिसंबर 2025 में कुल बैंक क्रेडिट का 9% ) यह दर्शाती है कि वे सस्ते फंड्स तलाश रहे हैं, न कि बैंक उन्हें कम लोन दे रहे हैं।

बैंकों के स्ट्रक्चरल फायदे

बैंकों की कॉम्पिटिटिव लेंडिंग रेट्स ऑफर करने की क्षमता उनके स्टेबल और कम लागत वाले डिपॉजिट बेस में निहित है। एक से दो साल की अवधि के लिए पब्लिक सेक्टर बैंकों के फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) रेट्स आम तौर पर 5-6.5% और प्राइवेट बैंकों के लिए 6.50-7% तक हैं। यह बॉन्ड मार्केट में उपलब्ध यील्ड्स या NBFCs की बरोइंग कॉस्ट से काफी कम है। इसके विपरीत, AAA-रेटेड NBFC बॉन्ड ने दिसंबर 2025 तक 7.40% तक के कूपन रेट ऑफर किए। फंडिंग स्ट्रक्चर का यह मूलभूत अंतर बैंकों को आकर्षक लेंडिंग रेट्स ऑफर करते हुए अपने मार्जिन बनाए रखने की सुविधा देता है, ऐसी स्थिति जिसे NBFCs के लिए दोहराना मुश्किल है।

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