देश में बारिश की **12.6%** कमी और क्लाइमेट रिस्क के चलते अब बैंक रूरल लोन (Rural Loans) देने में सावधानी बरत रहे हैं। हालांकि कुछ बड़े बैंकों ने अपना एग्री-पोर्टफोलियो बढ़ाया है, लेकिन कुल लोन बुक में इसकी हिस्सेदारी घट रही है।
देश भर में बैंकिंग सेक्टर अब रूरल लेंडिंग को लेकर काफी सतर्क हो गया है। बारिश में करीब 12.6% की कमी और कई राज्यों में सूखे जैसे हालात ने एग्रीकल्चरल आउटपुट को खतरे में डाल दिया है, जिसका सीधा असर किसानों की लोन चुकाने की क्षमता पर पड़ रहा है। खासकर महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में अनिश्चितता का माहौल है, जिससे बैंक अपनी रिस्क प्रोफाइल को बैलेंस कर रहे हैं।\n\n### बैंकों की अलग-अलग रणनीति\n\nसेक्टर में हर बैंक की अप्रोच अलग है। मिड-साइज बैंकों की बात करें तो RBL Bank ने अपने एग्रीकल्चरल लोन बुक में 12% की सालाना कटौती की है, और अब यह उनके कुल एडवांस का 1% से भी कम है। वहीं, Federal Bank ने भी इस सेगमेंट में 3% की गिरावट दर्ज की है और बैंक का मैनेजमेंट काफी सावधानी बरत रहा है।\n\nदूसरी ओर, बड़े प्राइवेट लेंडर्स की कहानी थोड़ी अलग है। Axis Bank ने अपने फार्म-लोन बुक को 20% बढ़ाया है, जबकि HDFC Bank का एग्रीकल्चरल पोर्टफोलियो 6.5% बढ़कर ₹1.3 लाख करोड़ तक पहुंच गया है। गौर करने वाली बात यह है कि इनके कुल लोन बुक में खेती के कर्ज की हिस्सेदारी कम हो रही है, जिससे साफ है कि ये बैंक अब कम जोखिम वाले सेक्टरों पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं।\n\n### निवेशकों के लिए क्यों है यह जरूरी?\n\nनिवेशकों के लिए मुख्य चिंता 'एसेट क्वालिटी' की है। अगर फसल खराब होती है, तो बैंकों के नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (NPA) यानी बैड लोन्स बढ़ सकते हैं। आने वाली तिमाही नतीजों में यह देखना दिलचस्प होगा कि बैंक अपनी एसेट क्वालिटी को कैसे मैनेज कर रहे हैं। आगामी रबी सीजन बैंकों के लिए एक बड़ा इम्तिहान साबित होगा, और जो बैंक इस दौरान रिस्क कम रखेंगे, वे लंबी अवधि में ज्यादा सुरक्षित नजर आएंगे।
