बैंक ऑफ बड़ौदा (Bank of Baroda) ने NMC Health से जुड़े केस में **$600 मिलियन (लगभग ₹5,700 करोड़)** के सेटलमेंट पर सहमति जताई है। इस भुगतान का बैंक की मौजूदा तिमाही की कमाई पर बड़ा असर पड़ने वाला है, जो पिछले साल के मुनाफे का लगभग पांचवां हिस्सा खत्म कर सकता है।
₹5,700 करोड़ का सेटलमेंट
बैंक ऑफ बड़ौदा (Bank of Baroda) ने NMC Health से जुड़े कानूनी दावों को निपटाने के लिए $600 मिलियन (लगभग ₹5,700 करोड़) के भुगतान पर सहमति जताई है। यह सेटलमेंट अदालत के बाहर हुआ है। बैंक ने किसी भी देनदारी को स्वीकार किए बिना यह समझौता किया है। बैंक पर आरोप था कि उसके दुबई ऑपरेशंस ने फर्जी बिलों के आधार पर क्रेडिट प्रोसेस करके धोखाधड़ी वाले फाइनेंसिंग में मदद की।
कानूनी दांव-पेंच और सेटलमेंट की वजह
कई सालों तक, बैंक ने यूएई के नियमों के तहत अपने ऑपरेशंस को गोपनीय रखा था। लेकिन, अक्टूबर 2025 में नए एंटी-मनी लॉन्ड्रिंग कानून लागू होने के बाद कानूनी माहौल बदला। नवंबर 2025 में अबू धाबी ग्लोबल मार्केट कोर्ट के एक फैसले ने एडमिनिस्ट्रेटर्स को बैंक के आंतरिक अनुपालन (compliance) डॉक्यूमेंटेशन तक पहुंचने की इजाजत दी। ये रिकॉर्ड 2026 की शुरुआत में मुकदमेबाजी के दौरान विवाद का केंद्र बने, और आखिरकार बैंक ने इस मुकदमेबाजी को खत्म करने के लिए सेटलमेंट का रास्ता चुना।
बैंक के वित्तीय नतीजों पर असर
विश्लेषकों का अनुमान है कि इस सेटलमेंट का टैक्स के बाद बैंक पर वित्तीय बोझ लगभग ₹4,300 करोड़ पड़ेगा। इस लागत का असर मौजूदा तिमाही के वित्तीय नतीजों में दिखने की उम्मीद है। यह रकम इतनी बड़ी है कि पिछले वित्तीय वर्ष में बैंक द्वारा दर्ज किए गए मुनाफे का लगभग 20% तक खत्म कर सकती है।
बैंक के पास लगभग ₹2,500 करोड़ के फ्लोटिंग प्रोविजन्स (आकस्मिकताओं के लिए अलग रखे गए फंड) हैं, लेकिन इस सेटलमेंट की लागत को पूरा करने के लिए इन रिजर्व्स का उपयोग करने हेतु भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की विशेष मंजूरी की आवश्यकता होगी। भले ही मंजूरी मिल जाए, यह कदम केवल तत्काल अकाउंटिंग प्रभाव को संभालेगा, न कि बैंक की नेट वर्थ पर पड़े वास्तविक वित्तीय बोझ को खत्म करेगा।
गवर्नेंस और भविष्य की राह
हालांकि इस सेटलमेंट से एक लंबे समय से चले आ रहे कानूनी मुद्दे का समाधान हो गया है, इसने बैंक के अंतरराष्ट्रीय ऑपरेशंस में आंतरिक नियंत्रण तंत्र पर सवाल उठाए हैं। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि इस घटना को एक पुरानी समस्या का समाधान माना जा रहा है, न कि मौजूदा प्रबंधन की किसी प्रणालीगत विफलता का संकेत। यह मामला अन्य पुराने बैंकिंग धोखाधड़ी मामलों से अलग है क्योंकि बैंक ऑफ बड़ौदा सीधे मुकदमे में एक पक्ष था, न कि केवल वसूली की मांग करने वाला क्रेडिटर।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) से उम्मीद की जाती है कि वह इन अंतरराष्ट्रीय ऑपरेशंस से जुड़े गवर्नेंस में हुई चूक की आंतरिक समीक्षा शुरू करेगा। निवेशक बैंक के आंतरिक अनुपालन ऑडिट और विदेशी शाखाओं पर निगरानी को मजबूत करने के उद्देश्य से किसी भी संभावित नियामक दिशानिर्देशों के बारे में भविष्य के अपडेट पर नजर रखेंगे।
