भारतीय बैंकों के लिए अब लोन बांटने से ज्यादा जरूरी 'मार्जिन' को सुरक्षित रखना हो गया है। डिपॉजिट की बढ़ती लागत ने मुनाफे पर दबाव डाल दिया है, जिससे निवेशकों का फोकस अब FY27 में Net Interest Margins (NIM) पर शिफ्ट हो गया है।
भारतीय बैंकिंग सेक्टर अब एक ऐसे मोड़ पर है जहां केवल लोन बुक बढ़ाना ही काफी नहीं है, बल्कि खर्चों पर लगाम लगाना ज्यादा अहम हो गया है। निवेशकों का ध्यान अब पूरी तरह से Net Interest Margin (NIM) पर है। आसान भाषा में समझें तो यह बैंक द्वारा लोन पर मिलने वाले ब्याज और डिपॉजिटर्स को दिए जाने वाले ब्याज का अंतर है। डिपॉजिट की लागत बढ़ने के कारण यह मार्जिन लगातार सिकुड़ रहा है।
प्रमुख बैंकों का हाल
हालिया आंकड़ों से साफ है कि दबाव कितना गहरा है। HDFC Bank का नेट इंटरेस्ट मार्जिन दूसरी तिमाही में 3.16% रहा, जो पिछली तिमाही के मुकाबले 10 बेसिस पॉइंट नीचे है। वहीं, ICICI Bank का मार्जिन भी 4.18% पर आ गया है, जो एक साल पहले 4.30% हुआ करता था। सिस्टम में क्रेडिट ग्रोथ 13% से 15% के बीच स्थिर होने के बावजूद, डिपॉजिट जुटाने की होड़ ने बैंकों की कमाई पर असर डाला है।
वन-टाइम गेन का खेल और वास्तविकता
मुनाफे की ग्रोथ हमेशा एक जैसी नहीं होती। उदाहरण के लिए, State Bank of India (SBI) ने दूसरी तिमाही में ₹23,038 करोड़ का नेट प्रॉफिट दर्ज किया, जो सालाना आधार पर 14.28% ज्यादा है। लेकिन, ध्यान देने वाली बात यह है कि इसमें एक बड़ा हिस्सा सब्सिडियरी कंपनी के शेयर बेचने से आए 'वन-टाइम गेन' का है। बाजार अब केवल हेडलाइन नंबर्स नहीं, बल्कि कोर अर्निंग्स को देख रहा है।
आगे की राह और रिस्क
फिलहाल बैंक रिटेल और सर्विस सेक्टर की मजबूत मांग का फायदा उठा रहे हैं, लेकिन रिस्क अभी टला नहीं है। एसेट क्वालिटी और खराब कर्ज (Bad Debts) पर नजर रखना निवेशकों के लिए जरूरी है। साथ ही, RBI की पॉलिसी और महंगाई के आंकड़े भी आने वाले समय में लैंडिंग रेट्स पर असर डालेंगे। आने वाले महीनों में मैनेजमेंट की कमेंट्री यह तय करेगी कि कौन सा बैंक अपने डिपॉजिट कॉस्ट को कम करके मार्जिन को बेहतर कर पाता है।
