FY26 में बैंकिंग फ्रॉड के मामले उछलकर **₹48,021 करोड़** तक पहुंच गए हैं। RBI का डेटा बताता है कि इसका बड़ा हिस्सा डिजिटल पेमेंट से नहीं, बल्कि लोन (Advances) पोर्टफोलियो से जुड़ा है। हालांकि, अच्छी बात यह है कि डिजिटल पेमेंट फ्रॉड के मामलों में भारी गिरावट आई है।
लोन पोर्टफोलियो में सबसे ज्यादा खतरा
RBI के हालिया डेटा के मुताबिक, फ्रॉड की कुल वैल्यू में 85% हिस्सा केवल लोन (Advances) का है, जो करीब ₹40,774 करोड़ बैठता है। आम तौर पर चर्चा डिजिटल पेमेंट फ्रॉड की होती है, लेकिन असल खतरा बैंकों के लोन पोर्टफोलियो में छिपा है। डेटा के अनुसार, डिजिटल पेमेंट फ्रॉड के मामले पिछले साल के 13,332 से घटकर अब केवल 293 रह गए हैं, जो दर्शाता है कि साइबर-सिक्योरिटी सिस्टम अब पहले से अधिक मजबूत हुए हैं।
सरकारी बैंकों पर सबसे ज्यादा मार
रिपोर्टेड फ्रॉड के कुल आंकड़ों में पब्लिक सेक्टर बैंकों (PSBs) की हिस्सेदारी 74.5% है। आंकड़ों में यह उछाल इसलिए भी दिख रहा है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद पिछले वर्षों के 314 केस, जिनकी वैल्यू ₹30,199 करोड़ थी, उन्हें इस बार रीक्लासिफाई किया गया है। निवेशकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि यह आंकड़ा आर्टिफिशियली बढ़ा हुआ दिख रहा है।
बढ़ते डिजिटल खतरे
Experian जैसी फर्मों की रिपोर्ट के मुताबिक, भले ही मामले कम हुए हों, लेकिन फ्रॉड का तरीका बदल गया है। अब 'Authorised Push Payment' (APP) फ्रॉड और अकाउंट टेकओवर के मामले बढ़ रहे हैं, जो AI-ड्रिवन तकनीक का इस्तेमाल करते हैं और जिन्हें पकड़ना काफी मुश्किल होता है।
निवेशकों के लिए सबक
बैंकों के लिए अब चुनौती दोहरी है: एक तरफ लोन की मॉनिटरिंग और दूसरी तरफ डिजिटल सुरक्षा। निवेशकों को बैंकों के अंडरराइटिंग स्टैंडर्ड्स और उनके क्रेडिट रिस्क मैनेजमेंट पर पैनी नजर रखनी चाहिए, क्योंकि फ्रॉड के कारण होने वाली प्रोविजनिंग सीधे तौर पर बैंकों के प्रॉफिट पर असर डालती है।
