भारतीय बैंकों की क्रेडिट ग्रोथ (Credit Growth) जुलाई के मध्य तक यानी 15 जुलाई को समाप्त हुए पखवाड़े में घटकर **17.7%** रह गई है, जो पिछली अवधि के **18.6%** से कम है। हालांकि, मांग अभी भी मजबूत बनी हुई है।
Detailed Coverage
क्रेडिट ग्रोथ में आई थोड़ी सुस्ती
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, देश भर में बैंकों द्वारा लोन बांटने की रफ्तार में मामूली नरमी आई है। 15 जुलाई को समाप्त हुए पखवाड़े में, साल-दर-साल आधार पर बैंक क्रेडिट ग्रोथ 17.7% पर पहुंच गई। यह इससे पिछली दो-सप्ताह की अवधि में दर्ज की गई 18.6% की ग्रोथ रेट से थोड़ी कम है, जो कि दो साल का उच्च स्तर था।
जमा ग्रोथ और लिक्विडिटी पर असर
क्रेडिट विस्तार में आई इस नरमी के साथ ही जमा (Deposit) ग्रोथ की रफ्तार भी धीमी हुई है। यह पिछले पखवाड़े के 13.3% से घटकर 12.7% हो गई। बैंकिंग सिस्टम में कुल जमा राशि ₹262.9 लाख करोड़ तक पहुंच गई। वहीं, कुल बकाया क्रेडिट ₹217.3 लाख करोड़ रहा। इससे क्रेडिट-डिपॉजिट रेशियो (यानी बैंक अपनी जमा राशि का कितना हिस्सा लोन के तौर पर दे रहे हैं) 82.68% पर बना हुआ है। यह एक ऊंचा स्तर है, जो बताता है कि बैंक अपनी जमा राशि का एक बड़ा हिस्सा लोन में दे रहे हैं। अगर जमा ग्रोथ, लोन की मांग के हिसाब से नहीं बढ़ी, तो इससे लिक्विडिटी (तरलता) पर दबाव बढ़ सकता है।
लोन की मांग के मुख्य कारण
क्रेडिट ग्रोथ की रफ्तार थोड़ी कम होने के बावजूद, बैंकिंग सेक्टर का कहना है कि लोन की मांग मजबूत बनी हुई है। कॉर्पोरेट सेक्टर में ग्रोथ लोन पोर्टफोलियो का एक मुख्य जरिया बनी हुई है। इसके अलावा, बैंक माइक्रो, स्मॉल और मीडियम एंटरप्राइजेज (MSMEs) को भी सक्रिय रूप से लोन दे रहे हैं। सरकारी स्कीमें, जो छोटे व्यवसायों के लिए क्रेडिट गारंटी प्रदान करती हैं, भी इसमें मदद कर रही हैं। इनका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच व्यवसायों को लिक्विडिटी मिलती रहे।
निवेशकों के लिए क्या है महत्वपूर्ण?
निवेशकों के लिए, क्रेडिट-डिपॉजिट रेशियो की स्थिरता पर नजर रखना अहम होगा। यदि क्रेडिट ग्रोथ, डिपॉजिट ग्रोथ से लगातार काफी आगे निकलती है, तो बैंकों पर डिपॉजिट पर ब्याज दरें बढ़ाने का दबाव आ सकता है ताकि अधिक फंड आकर्षित किए जा सकें। इससे उनके नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) पर असर पड़ सकता है। निवेशक इस पर भी नजर रखेंगे कि आने वाली तिमाहियों में कॉर्पोरेट मांग मजबूत बनी रहती है या ऊंची ब्याज लागत के कारण कंपनियां अपने उधार लेने की योजनाएं कम करती हैं। आरबीआई द्वारा हर पखवाड़े जारी किए जाने वाले क्रेडिट और डिपॉजिट के आंकड़े बैंकिंग सेक्टर की बैलेंस शीट की सेहत का पता लगाने के लिए महत्वपूर्ण रहेंगे।
