Bandhan AMC के फिक्स्ड इनकम हेड सुयश चौधरी का मानना है कि RBI रेपो रेट में **100-125 बेसिस पॉइंट्स** की और बढ़ोतरी कर सकता है। अगर रेपो रेट **6.5%** तक पहुंचता है, तो निवेशकों को अपनी पूंजी बचाने के लिए शॉर्ट-ड्यूरेशन फंड्स और हाई-क्वालिटी क्रेडिट पर फोकस करना चाहिए।
ब्याज दरों के चक्र में कैसे रहें सुरक्षित?
RBI द्वारा ब्याज दरें बढ़ाने का सीधा असर डेट म्यूचुअल फंड्स पर पड़ता है। जब यील्ड (Yield) बढ़ती है, तो बॉन्ड की कीमतें गिरने लगती हैं, जिससे फंड्स की एनएवी (NAV) में शॉर्ट-टर्म गिरावट आ सकती है। सुयश चौधरी के अनुसार, निवेशकों को घबराने की जरूरत नहीं है। मार्केट टॉप का इंतजार करने के बजाय, रिटेल निवेशकों को 'शॉर्ट-ड्यूरेशन डेट फंड्स' (Short-duration debt funds) को प्राथमिकता देनी चाहिए। कम अवधि के फंड्स में रिस्क कम होता है और ब्याज दरें बढ़ने पर ऊंचे रिटर्न वाले बॉन्ड्स में दोबारा निवेश करने का मौका जल्दी मिलता है।
क्रेडिट क्वालिटी से समझौता न करें
महंगाई के दौर में अक्सर निवेशक ज्यादा रिटर्न के चक्कर में कम रेटिंग वाले कॉरपोरेट बॉन्ड्स में फंस जाते हैं। सुयश चौधरी इस रणनीति को खतरनाक बताते हैं। उनका कहना है कि डेट पोर्टफोलियो का असली मकसद इक्विटी मार्केट में होने वाली हलचल के बीच एक 'सेफ्टी बफर' (Safety buffer) के तौर पर काम करना है। इसलिए, लिक्विडिटी और स्टेबिलिटी के लिए हमेशा हाई-क्वालिटी क्रेडिट वाले एसेट्स को ही चुनें।
पोर्टफोलियो का बैलेंस और जोखिम
पर्सनल फाइनेंस को मैनेज करने के लिए एसेट एलोकेशन का संतुलन बेहद जरूरी है। आमतौर पर 40% फिक्स्ड इनकम और 60% ग्रोथ एसेट्स (जैसे इक्विटी) का अनुपात सही माना जाता है। इस अनुपात को तय करते समय ईपीएफ (EPF) और बैंक डिपॉजिट जैसे सुरक्षित साधनों को भी ध्यान में रखें। इसके अलावा, विदेशी डेट फंड्स के लुभावने रिटर्न के चक्कर में न पड़ें, क्योंकि इनमें करेंसी रिस्क (Currency risk) काफी ज्यादा होता है। अनुशासन बनाए रखें और डेट फंड्स को सिर्फ सुरक्षित निवेश के तौर पर देखें, न कि जल्दी मुनाफा कमाने के टूल के रूप में।
