Bureau of Indian Standards (BIS) ने बैंकिंग सेक्टर के लिए एन्क्रिप्शन की मैनेजमेंट के कड़े नियम लागू कर दिए हैं। ISO 20038:2026 स्टैंडर्ड्स को अपनाते हुए सरकार का मकसद बढ़ते फाइनेंशियल फ्रॉड को रोकना है, जिसकी वैल्यू फाइनेंशियल ईयर 2026 में **₹48,021 करोड़** तक पहुंच गई थी। इस फैसले से बैंकों के टेक्नोलॉजी खर्च में इजाफा होना तय है।
सुरक्षा के नए कड़े पैमाने
Bureau of Indian Standards (BIS) ने बैंकिंग सेक्टर के लिए डेटा सुरक्षा प्रोटोकॉल को और अधिक सख्त बना दिया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर के ISO 20038:2026 मानकों को अपनाते हुए, सरकार ने बैंकों के लिए ट्रांजेक्शन डेटा को सुरक्षित रखने के तरीके बदल दिए हैं। अब क्रिप्टोग्राफिक की (Cryptographic keys)—जो डिजिटल ट्रांजेक्शन की रीढ़ हैं—उन्हें स्टोर और ट्रांसपोर्ट करने के लिए कड़े नियमों का पालन करना अनिवार्य होगा।
फ्रॉड का बढ़ता गणित
यह बदलाव ऐसे समय में आया है जब भारत में फ्रॉड का स्वरूप बदल गया है। फाइनेंशियल ईयर 2026 में फ्रॉड के मामलों की कुल संख्या घटकर 10,114 रह गई है, जो पिछले साल के मुकाबले 57.4% कम है। लेकिन, चौंकाने वाली बात यह है कि इन फ्रॉड की कुल राशि उछलकर ₹48,021 करोड़ हो गई। इसका मतलब है कि अब फ्रॉड करने वाले कम लेकिन बड़े और हाई-वैल्यू वाले अपराधों पर ध्यान दे रहे हैं। इनमें पब्लिक सेक्टर बैंक सबसे ज्यादा प्रभावित हैं, जिनका कुल फ्रॉड वैल्यू में करीब 74.5% हिस्सा है।
निवेशकों की चिंता: ऑपरेटिंग कॉस्ट
इन्वेस्टर्स के लिए सबसे बड़ी चिंता बैंकों का बढ़ता खर्च है। RBI के जुलाई 2026 के साइबर सिक्योरिटी फ्रेमवर्क के बाद, अब BIS के नए मानकों को लागू करने के लिए बैंकों को अपने पुराने IT इंफ्रास्ट्रक्चर को अपग्रेड करना होगा। अधिकांश बैंकों का लेगेसी सॉफ्टवेयर इन नए सुरक्षा पैमानों के अनुकूल नहीं है, जिसके चलते सिस्टम अपग्रेड, स्टाफ ट्रेनिंग और ऑपरेशनल रिस्क जैसे खर्च बढ़ने की पूरी संभावना है।
आने वाली तिमाही के नतीजों में निवेशकों को नजर रखनी चाहिए कि कैसे मैनेजमेंट इन बढ़ते compliance costs को संभालता है। बैंक कैसे इन सख्त सुरक्षा नियमों को लागू करते हुए अपने प्रॉफिट मार्जिन को सुरक्षित रखते हैं, यही शेयर की चाल तय करने वाला मुख्य फैक्टर होगा।
