ब्रिटेन की दिग्गज इंश्योरेंस कंपनी Aviva Plc भारत में अपने लाइफ इंश्योरेंस बिजनेस का 100% मालिकाना हक हासिल करने जा रही है। कंपनी ने अपने ज्वाइंट वेंचर पार्टनर Dabur Invest Corp. से बाकी बची **26%** हिस्सेदारी खरीदने का समझौता किया है। इस डील के बाद Aviva भारत में अपनी स्थानीय कंपनी की पूरी मालकिन बनने वाली पहली विदेशी इंश्योरर बन जाएगी।
एक युग का अंत, नई शुरुआत
Aviva और Dabur के बीच यह ज्वाइंट वेंचर साल 2000 से चल रहा था। शुरुआत में Aviva की हिस्सेदारी 49% थी, जिसे धीरे-धीरे बढ़ाते हुए 2022 में 74% तक ले जाया गया था। अब बाकी 26% हिस्सेदारी के अधिग्रहण के साथ, Aviva भारत में पूरी तरह से स्वतंत्र रूप से काम कर सकेगी। कंपनी का मानना है कि इस कदम से कंपनी को तेजी से बदलते भारतीय बाजार में बेहतर रणनीति बनाने और निर्णय लेने में मदद मिलेगी।
धीमी ग्रोथ और वितरण नेटवर्क की चुनौतियाँ
हालांकि, Aviva को भारत में अपनी ग्रोथ बढ़ाने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा है। कंपनी का वितरण नेटवर्क (Distribution Network) अभी भी काफी सीमित है। भारत की विशाल आबादी तक पहुंचने के लिए यह एक बड़ी चुनौती है। इंडस्ट्री के जानकारों का कहना है कि Aviva की ग्रोथ उन कंपनियों से धीमी रही है, जिन्होंने बैंकों के साथ मिलकर इंश्योरेंस प्रोडक्ट्स बेचे हैं। Aviva के फिलहाल सिर्फ 93 ब्रांच ही पूरे भारत में फैले हुए हैं।
वित्तीय तस्वीर: मुनाफे में गिरावट, बैलेंस शीट मजबूत
वित्तीय वर्ष 2025-26 के आंकड़ों पर नजर डालें तो Aviva Life Insurance Company India के नए बिजनेस प्रीमियम में 10% का इजाफा हुआ और यह ₹351 करोड़ तक पहुंच गया। हालांकि, कुल प्रीमियम आय में मामूली 2.8% की बढ़ोतरी के साथ यह ₹1,343 करोड़ रही। सबसे चिंताजनक बात यह है कि नेट प्रॉफिट में 21.7% की भारी गिरावट आई और यह ₹84.15 करोड़ पर आ गया।
इसके बावजूद, कंपनी की बैलेंस शीट मजबूत बनी हुई है। 31 मार्च 2026 तक, कंपनी के पास ₹16,316 करोड़ का एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) था। वहीं, सॉल्वेंसी रेशियो 188% रहा, जो कि रेगुलेटर द्वारा तय 150% की सीमा से काफी ऊपर है। इसका मतलब है कि कंपनी अपने पॉलिसीधारकों के प्रति अपनी देनदारियों को पूरा करने में सक्षम है। शेयरधारकों का फंड ₹878 करोड़ था।
आगे क्या?
अब यह देखना अहम होगा कि Aviva अपनी नई आजादी का इस्तेमाल करके अपने वितरण नेटवर्क को कैसे मजबूत करती है और क्या वह लाभप्रदता (Profitability) के मोर्चे पर सुधार कर पाती है। निवेशकों की नजरें कंपनी की रणनीतियों और बाजार में उसकी स्थिति पर टिकी रहेंगी।
