Air India अपनी फ्लीट विस्तार और ऑपरेशंस के लिए **₹10,000 करोड़** का नया कर्ज जुटाने की तैयारी में है। हालांकि, कंपनी के बढ़ते घाटे के कारण प्राइवेट लेंडर्स लोन देने में काफी सावधानी बरत रहे हैं और कैश फ्लो को लेकर स्पष्टता मांग रहे हैं।
भारी कर्ज का दबाव और घटता मुनाफा
एयर इंडिया इस समय ₹10,000 करोड़ का फ्रेश डेट (Debt) जुटाने की कोशिश में है, जिसका उपयोग विमानों के नवीनीकरण और डेली ऑपरेशंस में किया जाएगा। एयरलाइन की क्रेडिट रेटिंग अच्छी होने के बावजूद, प्राइवेट सेक्टर के बैंक सतर्क रुख अपनाए हुए हैं। इसकी मुख्य वजह कंपनी के हालिया फाइनेंशियल रिजल्ट्स हैं।
FY26 (मार्च 2026) के लिए एयर इंडिया का कंसोलिडेटेड घाटा बढ़कर ₹22,238 करोड़ पहुंच गया है, जो पिछले साल के ₹10,858 करोड़ के मुकाबले दोगुना से भी ज्यादा है। इस गिरावट में विदेशी मुद्रा (Forex) का नुकसान एक बड़ा कारण रहा, जो बढ़कर ₹7,388 करोड़ हो गया है। मौजूदा समय में एयरलाइन पर ₹40,000 करोड़ का कर्ज पहले से ही है, जिसे देखते हुए बैंक कड़े कदम उठा रहे हैं।
टाटा ग्रुप की भूमिका और भरोसा
प्राइवेट बैंकों की सख्ती के बीच, सरकारी बैंक पुराने क्रेडिट लाइन्स को रिन्यू करने में अधिक सहज दिख रहे हैं, जिसका मुख्य आधार टाटा ग्रुप के साथ उनका पुराना संबंध है। फिलहाल टाटा संस की एयरलाइन में 74.9% हिस्सेदारी है, जबकि सिंगापुर एयरलाइंस के पास 25.1% स्टेक है।
टाटा बोर्ड ने जून 2026 में ₹10,000 करोड़ से अधिक के कैपिटल इन्फ्यूजन (Capital Infusion) को मंजूरी दी थी। साथ ही, प्रमोटर ने कम से कम 51% हिस्सेदारी बनाए रखने का वादा भी किया है। एयरलाइन का भविष्य अब इस पर टिका है कि वह अपनी ऑपरेशनल लागत को कितना नियंत्रित कर पाती है और कैश फ्लो को कैसे सुधारती है।
