भारत के होम लोन बाजार में अफोर्डेबल हाउसिंग का दबदबा कायम है और कुल लोन में इसकी हिस्सेदारी **68%** है। हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा रेपो रेट में **25 बेसिस पॉइंट्स** की बढ़ोतरी से इस सेक्टर के सामने चुनौतियां खड़ी हो गई हैं।
भारत के रिटेल क्रेडिट ग्रोथ में अफोर्डेबल हाउसिंग एक बड़ा इंजन बनकर उभरी है। छोटे शहरों (Tier II और Tier III) में विस्तार के चलते अब कुल एक्टिव होम लोन में इस सेगमेंट का हिस्सा 68% हो गया है। हालांकि, रिजर्व बैंक द्वारा रेपो रेट को 5.50% करने के फैसले ने लेंडर्स के लिए समीकरण बदल दिए हैं।
HFCs पर बढ़ता दबाव
अगस्त 2026 तक हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों (HFCs) ने बाजार में 31.4% हिस्सेदारी हासिल कर ली है। ये कंपनियां डिजिटल अंडरराइटिंग के जरिए उन ग्राहकों तक पहुंच रही हैं जिनका क्रेडिट स्कोर पहले उपलब्ध नहीं था। लेकिन रेपो रेट बढ़ने से इनकी फंडिंग कॉस्ट बढ़ेगी, जिससे मार्जिन पर दबाव पड़ना तय है। अब इन कंपनियों को तय करना होगा कि क्या वे इस बोझ को ग्राहकों पर डालेंगी या खुद उठाएंगी।
मुनाफे के लिए नई रणनीति
दबाव को संतुलित करने के लिए लेंडर्स अब हाई-यील्ड प्रोडक्ट्स की ओर रुख कर रहे हैं। कई कंपनियां Micro Loan Against Property (LAP) पोर्टफोलियो को बढ़ा रही हैं, जो रेगुलर होम लोन से बेहतर मार्जिन देते हैं।
निवेशकों के लिए जरूरी बातें
एसेट क्वालिटी की बात करें तो ₹10-25 लाख के लोन सेगमेंट में मजबूती दिख रही है, लेकिन ₹10 लाख से कम वाले लोन कैटेगरी में रिस्क बना हुआ है। आने वाले समय में निवेशकों को इन तीन बातों पर नजर रखनी चाहिए:
- ब्याज दरों का नई लोन डिमांड पर असर।
- HFCs की नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) बनाए रखने की क्षमता।
- छोटे टिकट वाले लोन बुक की परफॉर्मेंस।
