Affordable Housing Finance: FY28 तक 19-20% की रफ्तार से दौड़ेगा यह सेक्टर, Crisil की रिपोर्ट में खुलासा

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AuthorNeha Patil|Published at:
Affordable Housing Finance: FY28 तक 19-20% की रफ्तार से दौड़ेगा यह सेक्टर, Crisil की रिपोर्ट में खुलासा

भारत में अफोर्डेबल हाउसिंग फाइनेंस (AHFC) सेक्टर आने वाले सालों में जबरदस्त ग्रोथ के लिए तैयार है। Crisil की एक रिपोर्ट के मुताबिक, यह सेक्टर वित्त वर्ष 2028 तक हर साल अपने एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) को **19-20%** की रफ्तार से बढ़ाएगा।

क्या हैं ग्रोथ के कारण?

Crisil की रिपोर्ट बताती है कि AHFCs की ग्रोथ की रफ्तार पिछले वित्त वर्ष की 19% की ग्रोथ के बराबर ही बनी रहेगी। यह ग्रोथ खास तौर पर टियर-2 और छोटे शहरों में मजबूत डिमांड और सेल्फ-कंस्ट्रक्शन (खुद के घर बनाने) के लिए लोन की बढ़ती मांग से प्रेरित है। जबकि बड़े मेट्रो शहरों में रियल एस्टेट की रफ्तार थोड़ी धीमी हुई है, AHFCs को इसका खास असर नहीं पड़ेगा क्योंकि उनके 75% से ज्यादा लोन ₹35 लाख से कम के हैं और ये छोटे शहरों में केंद्रित हैं। ये सेक्टर अक्सर सेल्फ-एम्प्लॉयड (स्वरोजगार) और पहली बार घर खरीदने वालों को टारगेट करता है, जिनकी अर्बनाइजेशन (शहरीकरण) और अफोर्डेबिलिटी (किफायती) के कारण मांग बढ़ रही है।

बिजनेस के मुख्य ड्राइविंग फैक्टर्स

सेक्टर की मजबूती उसके प्रोडक्ट मिक्स से भी आती है। होम लोन AUM का करीब 68% है और इसमें लगातार बढ़ोतरी की उम्मीद है। वहीं, प्रॉपर्टी पर लोन (LAP) एक बड़ा ग्रोथ इंजन बना हुआ है, जिसके 23% तक बढ़ने का अनुमान है। LAP की खासियत यह है कि इसमें होम लोन की तुलना में ज्यादा यील्ड (मुनाफा) मिलता है, जो कंपनियों को बढ़ती प्रतिस्पर्धा में मार्जिन बनाए रखने में मदद करता है। इसके अलावा, सेक्टर का करीब 45% लेंडिंग सेल्फ-कंस्ट्रक्शन और रीसेल प्रॉपर्टीज की तरफ जा रहा है, जिससे यह नए बड़े प्रोजेक्ट्स की लॉन्चिंग पर कम निर्भर है।

जोखिम और चुनौतियां

हालांकि, ग्रोथ की उम्मीदें अच्छी हैं, लेकिन इस सेक्टर में कुछ जोखिम भी हैं। छोटे टिकट साइज (₹10 लाख से कम) के लोन में बॉरोअर (कर्जदार) लेवरेज (कर्ज का बोझ) का दबाव बना हुआ है। माइक्रोफाइनेंस से कुछ स्ट्रेस (तनाव) का असर इन पर भी पड़ा है, जिस कारण कंपनियों को अपनी अंडरराइटिंग (लोन देने की शर्तें) सख्त करनी पड़ी है। इसके अलावा, महंगाई (Inflation) या ब्याज दरों में उतार-चढ़ाव (Interest Rate Fluctuations) बॉरोअर की कैश फ्लो को प्रभावित कर सकते हैं, जिससे लेंडर्स को सतर्क रहने की जरूरत है। बड़ी हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों और बैंकों से बढ़ती प्रतिस्पर्धा (Competition) भी इंटरेस्ट मार्जिन पर असर डाल सकती है।

निवेशकों को क्या देखना चाहिए?

आगे चलकर, निवेशकों को यह देखना होगा कि कंपनियां अपने पोर्टफोलियो को बढ़ाते हुए और नए इलाकों में विस्तार करते हुए एसेट क्वालिटी (संपत्ति की गुणवत्ता) कैसे बनाए रखती हैं। ग्रॉस स्टेज 3 (खराब लोन) के रेश्यो पर नजर रखना अहम होगा, क्योंकि अगर इसमें मामूली भी बढ़ोतरी देखी जाती है तो यह भविष्य में स्ट्रेस का संकेत हो सकता है। साथ ही, फंड की लागत (Cost of Funds) में बदलाव और कंपनियां इस लागत को ग्राहकों पर कैसे पास करती हैं, यह मार्जिन की स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण होगा। 20% की ग्रोथ रेट को बनाए रखते हुए समझदारी से लेंडिंग स्टैंडर्ड्स को बनाए रखना ही आने वाले सालों में इस सेक्टर के लिए मुख्य फोकस रहेगा।

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