Aditya Birla Group अपनी Sprng Energy की ₹17,200 करोड़ की डील को पूरा करने के लिए डोमेस्टिक बैंकों से लगभग ₹14,000 करोड़ का लॉन्ग-टर्म लोन लेने की तैयारी में है। यह डील कंपनी की ग्रीन एनर्जी क्षमता को बढ़ाने में एक बड़ा कदम साबित होगी, हालांकि निवेशक इस कर्ज के असर पर नजर रखेंगे।
₹14,000 करोड़ का कर्ज क्यों?
Aditya Birla Group ने रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर में अपनी बड़ी डील के लिए एक मजबूत फाइनेंसिंग प्लान तैयार किया है। ग्रुप डोमेस्टिक बैंकों के साथ करीब ₹14,000 करोड़ के लॉन्ग-टर्म लोन के लिए बातचीत के अंतिम चरण में है। इस फंड का इस्तेमाल Shell से Sprng Energy को खरीदने के लिए किया जाएगा, जिसकी एंटरप्राइज वैल्यू ₹17,200 करोड़ है।
फाइनेंसिंग का प्लान और बैंक
इस डील के लिए ग्रुप इंटरनेशनल ब्रिज फाइनेंसिंग के बजाय डोमेस्टिक सिंडिकेशन पर जोर दे रहा है। खबरों के मुताबिक, Axis Bank ने पूरी फैसिलिटी को अंडरराइट किया है और वह इसमें लगभग ₹5,000 करोड़ का हिस्सा रखेगा। State Bank of India और HDFC Bank जैसे अन्य बड़े बैंक भी अपनी भागीदारी का मूल्यांकन कर रहे हैं।
इस लोन की अवधि 20 साल तक की हो सकती है और ग्रुप लगभग 7.7% के इंटरेस्ट रेट का लक्ष्य रख रहा है। भारत में लॉन्ग-टेनोर डेट सिक्योर करके, ग्रुप अपनी उधारी लागत को कम करना और नए एक्वायर किए गए एसेट्स के लिए एक स्टेबल फाइनेंसियल स्ट्रक्चर तैयार करना चाहता है।
ग्रीन एनर्जी में बड़ा विस्तार
यह अधिग्रहण ग्रुप के रिन्यूएबल एनर्जी आर्म, Aditya Birla Renewables के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे पोर्टफोलियो में लगभग 5 GWp की कैपेसिटी जुड़ने की उम्मीद है, जिसमें 3.3 GWp ऑपरेशनल एसेट्स और 1.7 GWp कंस्ट्रक्शन के तहत हैं। इसके बाद ग्रुप की कुल रिन्यूएबल एनर्जी कैपेसिटी बढ़कर करीब 9.3 GWp हो जाएगी, जिससे यह इंडियन क्लीन एनर्जी मार्केट में एक बड़ा खिलाड़ी बन जाएगा। डील के इक्विटी हिस्से के लिए Grasim Industries और Global Infrastructure Partners द्वारा मैनेज किए जाने वाले फंड्स से सपोर्ट मिल रहा है।
निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण बातें
हालांकि यह विस्तार काफी महत्वपूर्ण है, कुछ ऐसे फैक्टर हैं जिन पर निवेशकों की नजर रहेगी, खासकर जब यह डील 31 दिसंबर, 2026 तक पूरी होने की ओर बढ़ रही है। सबसे अहम है कर्ज का बढ़ता बोझ। ₹14,000 करोड़ का नया कर्ज लेने का मतलब है कि कंपनी को हायर इंटरेस्ट पेमेंट मैनेज करना होगा, जिसका असर नियर-टर्म प्रॉफिटेबिलिटी पर पड़ सकता है।
इसके अलावा, एक यूटिलिटी-स्केल रिन्यूएबल बिजनेस को ग्रुप के मौजूदा ऑपरेशंस में इंटीग्रेट करने की चुनौती भी है। एग्जीक्यूशन रिस्क यानी स्मूथ ऑपरेशंस सुनिश्चित करना और प्रोजेक्ट रिटर्न्स को बनाए रखना अहम होगा। साथ ही, यह डील Competition Commission of India और Central Transmission Utility जैसी रेग्युलेटरी अप्रूवल्स के अधीन भी है। निवेशकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण यह होगा कि यह फाइनेंसिंग सफलतापूर्वक पूरी हो और अधिग्रहण किए गए एसेट्स को ग्रुप के बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर पोर्टफोलियो में प्रभावी ढंग से एकीकृत किया जाए।
