Asset Reconstruction Companies (ARCs), जैसे कि हाल ही में लिस्ट हुई ARCIL, अब बैंकों के फंसे हुए कर्ज यानी स्ट्रेस्ड लोन को मैनेज करने के लिए 'Collection-as-a-Service' मॉडल अपना रही हैं।
एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनियों (ARCs) का बिजनेस करने का तरीका अब बदल रहा है। पारंपरिक रूप से ये कंपनियां बैंकों के बैड लोन को डिस्काउंट पर खरीदती थीं और खुद रिकवरी करती थीं। लेकिन अब ARCIL जैसी दिग्गज कंपनियां 'Collection-as-a-Service' (CaaS) मॉडल पर जोर दे रही हैं।
क्यों बदल रही है रणनीति?
इस नए मॉडल के तहत, ARCs को खुद मोटी रकम खर्च करके बैड लोन खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती। इसके बजाय, वे बैंकों और NBFCs के लिए रिकवरी एजेंट की तरह काम करती हैं और इसके बदले फीस लेती हैं। इससे ARCs का कैपिटल कम फंसता है और कमाई का एक नया जरिया बन जाता है।
बैंकों के लिए भी यह फायदे का सौदा है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के नए ECL (Expected Credit Loss) फ्रेमवर्क के कारण बैंकों पर बैड लोन को जल्दी निपटाने का दबाव है। वे अब रिकवरी के काम को विशेषज्ञों (ARCs) को सौंपकर अपने बैलेंस शीट को क्लीन कर रहे हैं।
डेटा का बड़ा फायदा
'Collection-as-a-Service' का सबसे बड़ा प्लस पॉइंट यह है कि ARCs को एसेट की हेल्थ की पूरी जानकारी मिल जाती है। जब भविष्य में बैंक इन लोन को नीलाम करने का फैसला करते हैं, तो ARCIL जैसी कंपनियों को पता होता है कि उस एसेट की असल कीमत क्या है। इससे उन्हें बिडिंग (Bidding) में अपने प्रतिद्वंद्वियों से कहीं बेहतर 'इनफार्मेशन एज' मिल जाता है।
जोखिम और रेगुलेटरी निगरानी
निवेशकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि रिकवरी का काम बहुत संवेदनशील होता है। RBI के नियम बहुत सख्त हैं और अगर रिकवरी के दौरान कोई भी अनैतिक तरीका अपनाया गया, तो भारी जुर्माना लग सकता है। साथ ही, SARFAESI Act के बावजूद Debt Recovery Tribunals (DRTs) में मामलों का निपटारा काफी धीमा है, जो इस बिजनेस की रफ्तार को प्रभावित कर सकता है। निवेशकों के लिए यह देखना जरूरी होगा कि यह नया मॉडल ऑपरेटिंग मार्जिन में कितनी मजबूती लाता है।
