ARC का बैड लोन पर बड़ा दांव! ₹26,304 करोड़ की खरीदारी, 56% की छलांग

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AuthorMehul Desai|Published at:
ARC का बैड लोन पर बड़ा दांव! ₹26,304 करोड़ की खरीदारी, 56% की छलांग

एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनियों (ARCs) ने जून तिमाही में **₹26,304 करोड़** के फंसे हुए लोन खरीदे हैं। यह पिछले साल की तुलना में **56%** की बड़ी बढ़ोतरी है। जहां एक ओर बैंकिंग सेक्टर के बैड लोन का अनुपात कम हो रहा है, वहीं बैंक पुराने पोर्टफोलियो और रिटेल लोन को तेजी से निपटा रहे हैं।

ARC का जलवा: फंसे हुए कर्ज़ की खरीदारी 56% बढ़ी

भारतीय बैंकों से फंसे हुए कर्ज़ (Bad Loans) खरीदने में एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनियों (ARCs) ने ज़बरदस्त तेज़ी दिखाई है। चालू फाइनेंशियल ईयर की जून तिमाही में, इन कंपनियों ने ₹26,304 करोड़ की कीमत की स्ट्रेस्ड एसेट्स खरीदीं, जो पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले 56% ज़्यादा है। यह बढ़ोतरी इस बात का संकेत देती है कि बैंक अपने बैलेंस शीट से पुराने कर्ज़ को तेज़ी से हटाने की कोशिश कर रहे हैं।

चिंताजनक है रिटेल लोन का बढ़ता बोझ

यह सब तब हो रहा है जब बैंकिंग सेक्टर की सेहत वैसे भी सुधर रही है। सेक्टर का ग्रॉस नॉन-परफॉर्मिंग एसेट (GNPA) रेशियो FY26 में घटकर 1.8% हो गया है, जो दो साल पहले 2.8% था। लेकिन, यह मज़बूती बैंकों को अपने पुराने स्टॉक और खासकर छोटे, मुश्किल रिटेल लोन को निपटाने का मौका दे रही है। सरकारी बैंकों ने इस तिमाही में करीब ₹50,000 करोड़ के बैड डेट बिक्री के लिए रखे थे।

अब रिटेल लोन पर ARCs का फोकस

बाजार में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है – अब ARCs का फोकस बड़े कॉर्पोरेट लोन की बजाय रिटेल लोन पर बढ़ रहा है। रिटेल लोन में लाखों छोटे-छोटे अकाउंट होते हैं। FY26 में रिटेल स्ट्रेस्ड डेट की खरीद ₹54,727 करोड़ तक पहुँच गई है। यह ARCs के लिए नया बिज़नेस एरिया तो है, पर ऑपरेशनल तौर पर यह ज़्यादा मुश्किल है।

निवेशकों के लिए नए रिस्क

रिटेल लोन की तरफ यह बदलाव निवेशकों के लिए कुछ नए रिस्क लेकर आया है। लाखों छोटे लोन को संभालना कुछ बड़े कॉर्पोरेट लोन को संभालने से कहीं ज़्यादा मुश्किल है। साथ ही, रिकवरी रेट भी चिंताजनक है। अभी तक जो आंकड़े सामने आए हैं, उनके मुताबिक रिटेल बैड लोन से रिकवरी महज़ 15% है। अगर ARCs इन पैसों को वसूलने में नाकाम रहती हैं, तो बैंकों द्वारा जारी की गई सिक्योरिटी रिसीट्स (जो कर्ज़ के भुगतान या निवेश का एक रूप हैं) की वैल्यू कम हो सकती है।

इसके अलावा, कीमतों को लेकर भी एक समस्या बनी हुई है। बैंक इन एसेट्स को ज़्यादा से ज़्यादा कीमत पर बेचना चाहते हैं, जबकि ARCs ऐसी कीमत चाहती हैं जिसमें उन्हें मुनाफ़ा हो। जैसे-जैसे यह सेक्टर कैश-बेस्ड ट्रांज़ैक्शन की ओर बढ़ रहा है, ARCs की इन रिटेल पोर्टफोलियो को सफलतापूर्वक संभालने की क्षमता ही अगले कुछ क्वार्टर में सबसे बड़ा फैक्टर साबित होगी।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.