All-India Bank Officers’ Association (AIBOA) ने IDBI Bank के निजीकरण को रोकने के लिए विपक्षी नेताओं से मदद मांगी है। यूनियन का तर्क है कि 2003 में सरकार ने बहुमत हिस्सेदारी अपने पास रखने का वादा किया था, जिसे अब चुनौती दी जा रही है।
कानूनी रास्ता फेल, अब राजनीतिक दबाव की कोशिश
ऑल-इंडिया बैंक ऑफिसर्स एसोसिएशन (AIBOA) ने अब अपनी रणनीति बदल ली है। कानूनी अदालतों—दिल्ली हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट—से झटका मिलने के बाद, अब यूनियन ने लोकसभा और राज्यसभा के विपक्षी नेताओं, जिनमें राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे शामिल हैं, से संपर्क किया है। मांग यह है कि सरकार के निजीकरण के फैसले के खिलाफ संसद में आवाज उठाई जाए।
2003 का वह वादा और वर्तमान स्थिति
यूनियन का मुख्य तर्क 2003 के उस आश्वासन पर टिका है, जब सरकार ने IDBI (ट्रांसफर ऑफ अंडरटेकिंग एंड रिपील) बिल के दौरान वादा किया था कि वह बैंक की कम से कम 51% हिस्सेदारी अपने पास बनाए रखेगी। हालांकि, सरकार और भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) मिलकर बैंक में 60% से ज्यादा हिस्सेदारी बेचने की तैयारी में हैं।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
भले ही रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने 2019 में ही IDBI Bank को निजी क्षेत्र के बैंक के रूप में वर्गीकृत कर दिया था, लेकिन यूनियन का मानना है कि पब्लिक सेक्टर वाली विरासत के वादे अभी भी मायने रखते हैं। इस विरोध और अनिश्चितता के कारण विनिवेश (Divestment) की प्रक्रिया में लगातार देरी हो रही है। शेयर होल्डर्स के लिए अब सरकार के अगले कदम और संसद में होने वाली चर्चाएं सबसे बड़े ट्रिगर पॉइंट होंगे, क्योंकि इसी पर बैंक की भविष्य की दिशा तय होगी।
