आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल कर हो रहे वित्तीय फ्रॉड ने पूरी दुनिया में कोहराम मचा दिया है। डीपफेक और वॉइस क्लोनिंग जैसे हमलों के कारण अब तक **$3.7 बिलियन** से ज्यादा का नुकसान हो चुका है, जिससे बैंकों की सुरक्षा व्यवस्था पर दबाव बढ़ गया है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की तेजी ने फाइनेंशियल सेक्टर के लिए जोखिम का नया दायरा खोल दिया है। केवल 2025 में FBI के डेटा के अनुसार, अमेरिका में ही AI-आधारित स्कैम से $893 मिलियन का नुकसान हुआ है। वहीं, साइबर सिक्योरिटी फर्म Surfshark की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पूरी दुनिया में डीपफेक फ्रॉड से हुआ कुल नुकसान $3.7 बिलियन तक पहुंच चुका है।
धोखाधड़ी के बदले तरीके
साइबर अपराधी अब पुराने तरीकों को छोड़कर AI का इस्तेमाल कर रहे हैं। वे सोशल मीडिया से लोगों की आवाज कॉपी कर रहे हैं या कॉर्पोरेट अधिकारियों के डीपफेक वीडियो बनाकर लोगों को जाल में फंसा रहे हैं। ये स्कैमर्स अक्सर किसी इमरजेंसी का नाटक करते हैं, जिससे लोग डरकर बिना सोचे-समझे पैसे ट्रांसफर कर देते हैं।
बैंकों के लिए बड़ी चुनौती
डिजिटल पेमेंट सिस्टम की रफ्तार और फ्रॉड की तेजी के बीच बैंक पिस रहे हैं। अपराधी AI बॉट्स का उपयोग करके बैंक अकाउंट्स को चंद सेकंड में क्रैक कर रहे हैं। अब रेगुलेटर्स पर दबाव है कि वे लायबिलिटी (Liability) तय करें। यूके (UK) ने तो नया कानून भी लागू कर दिया है, जिसके तहत स्कैम का शिकार हुए ग्राहकों को बैंक को मुआवजा देना पड़ सकता है।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
निवेशकों के लिए यह स्थिति सतर्क रहने वाली है। आने वाले समय में:
- बढ़ता खर्च: बैंक साइबर सुरक्षा और AI फ्रॉड डिटेक्शन पर भारी निवेश करेंगे, जिससे उनके प्रॉफिट मार्जिन पर कुछ समय के लिए असर पड़ सकता है।
- रेगुलेटरी रिस्क: अगर सरकारों ने बैंकों की जवाबदेही बढ़ाई, तो फाइनेंशियल संस्थाओं पर वित्तीय बोझ बढ़ेगा।
- कंपीटिटिव एडवांटेज: जो बैंक अपने ग्राहकों को सुरक्षा का भरोसा देंगे, भविष्य में वही मार्केट में टिक पाएंगे।
