OFS में रिकॉर्ड ₹62,730 करोड़ जुटाए, पर निवेशकों को हुआ नुकसान! जानिए क्यों?

BANKINGFINANCE
Whalesbook Logo
AuthorAditi Chauhan|Published at:
OFS में रिकॉर्ड ₹62,730 करोड़ जुटाए, पर निवेशकों को हुआ नुकसान! जानिए क्यों?

साल 2026 भारतीय शेयर बाज़ार के लिए एक बड़ा साल रहा, जहाँ कंपनियों ने ऑफर फॉर सेल (OFS) के ज़रिए रिकॉर्ड **₹62,730 करोड़** जुटाए। यह मुख्य रूप से सरकारी कंपनियों के विनिवेश (divestment) से संभव हुआ। लेकिन, इस रिकॉर्ड के बावजूद, इन कंपनियों के निवेशकों के लिए तस्वीर फीकी नज़र आ रही है, क्योंकि पिछले 12 महीनों में आधे से ज़्यादा कंपनियों ने नेगेटिव रिटर्न दिया है।

सरकारी विनिवेश और LIC का जलवा

OFS में हुई इस भारी-भरकम गतिविधि के पीछे सरकारी कंपनियों की हिस्सेदारी बेचने का बड़ा हाथ है। सरकारी संस्थाओं ने कुल जुटाई गई रकम का 93% से ज़्यादा, यानी ₹58,425.12 करोड़ जुटाए। इसमें सबसे बड़ा योगदान लाइफ इंश्योरेंस कॉरपोरेशन (LIC) के बड़े हिस्सेदारी की बिक्री का रहा, जिससे अकेले ₹31,514.89 करोड़ मिले। इस एक डील ने ही सरकार के ₹80,000 करोड़ के सालाना विनिवेश लक्ष्य का लगभग दो-तिहाई हिस्सा पूरा करने में मदद की।

OFS स्टॉक्स का गिरता प्रदर्शन

भले ही OFS के ज़रिए भारी भरकम पैसा जुटाया गया हो, लेकिन शेयर बाज़ार में इन कंपनियों का प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा। पिछले 12 महीनों के आंकड़े बताते हैं कि 2026 में OFS का इस्तेमाल करने वाली आधी से ज़्यादा कंपनियों ने निवेशकों को नेगेटिव रिटर्न दिया है। इनमें ज़्यादातर पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्स (PSUs) शामिल हैं।

इंडियन रेलवे फाइनेंस कॉरपोरेशन (IRFC) के शेयर में पिछले साल 29.66% की गिरावट आई। इसी तरह, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया, कोचीन शिपयार्ड और जनरल इंश्योरेंस कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया जैसे सरकारी कंपनियों के शेयरों में भी गिरावट दर्ज की गई। वहीं, कुछ प्राइवेट कंपनियों जैसे आंचल इस्पात और स्वान डिफेंस एंड हैवी इंडस्ट्रीज़ ने इस दौरान शानदार रिटर्न दिया, जिससे पता चलता है कि सरकारी OFS सौदे दबाव में थे, जबकि कुछ प्राइवेट कंपनियों ने अपने शेयरधारकों के लिए अच्छा मुनाफा कमाया।

मैक्रो इकोनॉमिक दबाव और निवेशकों का नज़रिया

फिलहाल अर्थव्यवस्था कई चुनौतियों का सामना कर रही है, जिसका असर शेयर बाज़ार पर पड़ सकता है। भू-राजनीतिक तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने की आशंकाओं के चलते कच्चे तेल की कीमतों में तेज़ी आई है, जिससे देश का तेल आयात बिल बढ़ गया है। इससे सरकारी खर्च पर दबाव पड़ता है और बाज़ार में अनिश्चितता बढ़ती है।

निवेशकों के लिए, यह रिकॉर्ड फंडरेज़िंग साल एक बड़ा सबक सिखाता है: OFS का मतलब प्रमोटरों (promoters) के लिए अपनी हिस्सेदारी बेचने या पैसा जुटाने का एक तरीका है, न कि यह ज़रूरी है कि शेयर का भविष्य ग्रोथ वाला हो। भविष्य में OFS के अवसरों का विश्लेषण करते समय, केवल सरकारी विनिवेश की रणनीति से आगे देखना महत्वपूर्ण है। निवेशकों को कंपनी की वित्तीय सेहत, वैल्यूएशन और बिजनेस की संभावनाओं का मूल्यांकन करना चाहिए, न कि शेयर बिक्री की गहमागहमी पर भरोसा करना चाहिए। इन कंपनियों के टिकाऊ प्रॉफिट मार्जिन और डेट लेवल (debt levels) पर नज़र रखना उन लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण कदम होगा जो इन स्टॉक्स को अपने पोर्टफोलियो में रखते हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.