Volkswagen भारत में एक बड़े टैक्स विवाद में उलझ गई है। अधिकारियों का आरोप है कि कंपनी ने ड्यूटी बचाने के लिए इम्पोर्ट्स को गलत तरीके से दिखाया, जिससे अब JSW Group के साथ होने वाली पार्टनरशिप पर भी खतरा मंडरा रहा है।
कोर्ट में छिड़ी कानूनी जंग
मुंबई हाई कोर्ट में इस वक्त जर्मन ऑटोमेकर Volkswagen और भारतीय टैक्स अधिकारियों के बीच बड़ी कानूनी लड़ाई चल रही है। विवाद का मुख्य कारण इम्पोर्ट ड्यूटी का कम भुगतान है। सरकारी अधिकारियों का दावा है कि कंपनी पर करीब $1.2 बिलियन यानी ₹10,000 करोड़ से ज्यादा का बकाया टैक्स बनता है।
आरोप है कि Volkswagen ने इम्पोर्ट किए गए व्हीकल कंपोनेंट्स को 'पार्ट्स' बताकर 5% से 15% तक की कम ड्यूटी का फायदा उठाया, जबकि असल में ये गाड़ियां लगभग पूरी तरह तैयार थीं और उन पर 30% से 35% तक की ऊंची ड्यूटी लगनी चाहिए थी।
कंपनी का बचाव और दलीलें
Volkswagen ने इस डिमांड को पूरी तरह खारिज किया है। कंपनी की कानूनी टीम का कहना है कि यह जांच 12 साल पुराने मामलों की है, जबकि भारतीय टैक्स कानून के तहत इस तरह की जांच की सीमा आमतौर पर केवल 5 साल की होती है। कंपनी का तर्क है कि यह मांग न केवल अत्यधिक है, बल्कि कानूनी दायरे से बाहर है, जो भारत में उनके बिजनेस की फाइनेंशियल सेहत के लिए बड़ा खतरा है।
JSW Group के साथ डील पर असर
यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब Volkswagen भारतीय मार्केट में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए JSW Group के साथ रणनीतिक पार्टनरशिप की बातचीत कर रही है। किसी भी बड़ी डील से पहले पार्टनर कंपनी अपनी संभावित देनदारियों (liabilities) को लेकर स्पष्टता चाहती है। टैक्स की यह बड़ी डिमांड डील के वैल्यूएशन को प्रभावित कर सकती है या कानूनी फैसला आने तक बातचीत को टाल सकती है।
रेगुलेटरी अथॉरिटीज का यह कदम 'मेक इन इंडिया' को बढ़ावा देने और लोकल वैल्यू एडिशन सुनिश्चित करने के बड़े अभियान का हिस्सा है। आने वाले कोर्ट हियरिंग्स पर निवेशकों की नजर है, क्योंकि अंतिम फैसला न केवल Volkswagen की भारत में स्थिति तय करेगा, बल्कि विदेशी कंपनियों के लिए भारत के रेगुलेटरी माहौल को भी दर्शाएगा।
