US के भारत में राजदूत सर्जियो गोर ने भारतीय ऑटो कंपोनेंट सप्लायर्स को अमेरिका में मैन्युफैक्चरिंग प्लांट लगाने की सलाह दी है। बढ़ते टैरिफ और ट्रेड जांच के दबाव के बीच यह कदम निवेशकों के लिए कैपिटल स्पेंडिंग और मार्जिन को लेकर नए सवाल खड़ा कर रहा है।
अमेरिका अब यह चाहता है कि भारतीय ऑटो कंपोनेंट बनाने वाली कंपनियां सिर्फ एक्सपोर्ट पर निर्भर रहने के बजाय सीधे अमेरिकी धरती पर अपने कारखाने खोलें। 2 सितंबर, 2026 को ACMA के 66वें वार्षिक सत्र में US राजदूत सर्जियो गोर ने इसे सप्लाई चेन को सुरक्षित बनाने का एक बेहतर तरीका बताया।
क्यों बढ़ रहा है दबाव?
साल 2025 के अंत से ही एक्सपोर्ट का खेल मुश्किल हो गया है। अमेरिका ने कुछ मामलों में टैरिफ को 50% तक बढ़ा दिया है, जिससे भारतीय कंपनियों के मुनाफे पर भारी चोट पड़ रही है। इसके अलावा, Section 301 के तहत अमेरिकी सरकार की जांच ने भी उन कंपनियों के लिए अनिश्चितता पैदा कर दी है, जिनका सारा कारोबार भारत से माल भेजने पर टिका है।
निवेशकों के लिए क्या है दांव?
अमेरिका में 'ग्रीनफील्ड प्रोजेक्ट' शुरू करने से Ford, Cummins और BorgWarner जैसे बड़े क्लाइंट्स तक पहुंच तो आसान होगी, लेकिन इसका वित्तीय असर भी बड़ा होगा। अमेरिका में लेबर और रेगुलेटरी कॉस्ट भारत के मुकाबले काफी ज्यादा है। ऐसे में कंपनियों का कैश फ्लो और शॉर्ट-टर्म मार्जिन दबाव में आ सकता है। जो छोटी या मिड-साइज कंपनियां हैं, उनके लिए यह भारी कैपिटल स्पेंडिंग एक बड़ी चुनौती बन सकती है।
कौन सी कंपनियां आगे हैं?
Bharat Forge, Sundaram Clayton और Mahindra जैसी कंपनियां पहले ही अमेरिका में अपने नेटवर्क के साथ काम कर रही हैं। अमेरिकी सरकार ने भी 'Select USA Investment Summit' के जरिए मदद का भरोसा दिया है, लेकिन साथ ही यह शर्त भी रखी है कि भारत को भी अमेरिकी तकनीक और सप्लायर्स को घरेलू बाजार में बराबर का एक्सेस देना होगा।
अब शेयरधारकों की नजरें इस पर होनी चाहिए कि कंपनियां अपनी अगली तिमाही के नतीजों में US विस्तार को लेकर क्या कमेंट्री देती हैं और इस भारी निवेश के लिए फंड कहां से जुटाएंगी।
