भारत की टायर निर्माता कंपनियों ने सरकार से ड्यूटी-फ्री रबड़ इंपोर्ट करने की गुहार लगाई है। घरेलू बाजार में रबड़ के दाम **₹300 प्रति किलो** के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गए हैं, जिससे JK Tyre और CEAT जैसी कंपनियों के मुनाफे पर भारी दबाव बना हुआ है।
ऑटोमोटिव टायर मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ATMA) ने केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय को पत्र लिखकर रबड़ की बढ़ती लागत पर तत्काल राहत मांगी है। इंडस्ट्री की मांग है कि सरकार एक सीमित कोटा के तहत ड्यूटी-फ्री इंपोर्ट की इजाजत दे, ताकि लागत को काबू में रखा जा सके। पिछले साल के मुकाबले रबड़ की कीमतों में 62% का बड़ा उछाल आया है।
मार्जिन पर भारी असर
कच्चे माल की बढ़ती लागत टायर कंपनियों के लिए बड़ा सिरदर्द बनी हुई है। JK Tyre और CEAT जैसी दिग्गज कंपनियों के तिमाही नतीजों में मार्जिन पर दबाव साफ दिख रहा है। टायर निर्माता कंपनियों के लिए चुनौती यह है कि वे इन लागतों का पूरा बोझ ग्राहकों पर नहीं डाल पा रही हैं, जिससे सीधा असर उनकी प्रॉफिटेबिलिटी पर पड़ रहा है। पिछली तिमाही के आंकड़ों के अनुसार, कंपनियों की इनपुट कॉस्ट में 35–40% का इजाफा हुआ है जिसे पूरा कवर कर पाना मुश्किल साबित हो रहा है।
डिमांड और सप्लाई का गैप
इंडस्ट्री के सामने संकट सप्लाई में कमी का है। FY26 में देश में रबड़ का उत्पादन 9.05 लाख टन था, जबकि मांग 14.27 लाख टन तक पहुंच गई। 37% की इस सप्लाई कमी को पूरा करने के लिए कंपनियों को इंपोर्ट पर निर्भर रहना पड़ता है, लेकिन वर्तमान ड्यूटी स्ट्रक्चर के कारण इंपोर्ट महंगा पड़ता है। पीक टैपिंग सीजन के बावजूद सप्लाई न सुधरने से कंपनियों की मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी पर सवाल उठ रहे हैं।
अन्य आर्थिक चुनौतियां
सिर्फ नेचुरल रबड़ ही नहीं, सिंथेटिक रबड़ और कार्बन ब्लैक जैसे पेट्रो-लिंक्ड मटेरियल के दाम भी बढ़ रहे हैं। वेस्ट एशिया में भू-राजनीतिक तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता और लॉजिस्टिक्स खर्च ने मुसीबतें और बढ़ा दी हैं। हालांकि वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में टायर एक्सपोर्ट में 16% की बढ़त देखी गई थी, लेकिन रॉ मटेरियल की कीमतें अगर इसी तरह रिकॉर्ड स्तर पर बनी रहीं, तो इस गति को बनाए रखना चुनौतीपूर्ण होगा। निवेशकों को अब मंत्रालय के फैसले पर पैनी नजर रखनी चाहिए, क्योंकि इसी से कंपनियों के भविष्य के मार्जिन की तस्वीर साफ होगी।
