Suzuki Motor Corp भारत में Range-Extender Electric Vehicles (REEVs) पेश करने की तैयारी में है। इसमें छोटी बैटरी के साथ फ्यूल जनरेटर का इस्तेमाल होगा, जिससे गाड़ियों की लागत कम होगी। हालांकि, इनकी सफलता सरकारी टैक्स नियमों पर टिकी है।
Suzuki Motor Corp भारत में अपनी इलेक्ट्रिक व्हीकल रणनीति में बड़ा बदलाव करने जा रही है। कंपनी अब REEV यानी रेंज-एक्सटेंडर इलेक्ट्रिक गाड़ियों पर ध्यान केंद्रित कर रही है। इस तकनीक में आम इलेक्ट्रिक कारों के मुकाबले छोटी बैटरी का इस्तेमाल होता है, जिसे पावर देने के लिए एक छोटा फ्यूल-जनरेटर लगा होता है। यह जनरेटर चलते-फिरते बैटरी को चार्ज करता है, जिससे भारी और महंगी बैटरी की जरूरत खत्म हो जाती है। इसका सीधा फायदा गाड़ियों की मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट कम होने के रूप में मिलेगा, जिससे ये भारतीय ग्राहकों के लिए और किफायती हो सकेंगी।
भारत में प्रोडक्शन का विस्तार
सुजुकी भारत को अपनी नई पावरट्रेन तकनीक के लिए एक मुख्य बाजार मानती है। कंपनी का लक्ष्य 2030 तक भारत में सालाना 40 लाख गाड़ियां बनाने का है। इस लक्ष्य को पाने के लिए जापान की अत्याधुनिक तकनीक को भारतीय सब्सिडियरी Maruti Suzuki को ट्रांसफर किया जा रहा है। कंपनी की 'REEV Light' रणनीति का उद्देश्य भारतीय सड़क परिस्थितियों और उपयोग के हिसाब से बैटरी क्षमता को संतुलित करना है।
सरकारी टैक्स नीति का पेंच
यह तकनीक इन्फ्रास्ट्रक्चर और लागत की चुनौती को तो सुलझाती है, लेकिन सबसे बड़ी अनिश्चितता सरकारी टैक्स वर्गीकरण की है। अगर सरकार इन गाड़ियों को शुद्ध इलेक्ट्रिक वाहनों (Pure EVs) की तरह टैक्स लाभ नहीं देती है, तो हाइब्रिड और इन गाड़ियों के बीच का अंतर ग्राहकों को आकर्षित नहीं कर पाएगा। निवेशकों की नजर अब सरकार की नई पॉलिसी पर है, जो यह तय करेगी कि यह तकनीक बाजार में कितनी प्रतिस्पर्धी होगी।
बढ़ता कंपटीशन
सिर्फ सुजुकी ही नहीं, बल्कि Mahindra & Mahindra और JSW MG Motor India जैसी कंपनियां भी रेंज-एक्सटेंडर तकनीक पर काम कर रही हैं। यह ऑटो सेक्टर में एक बड़े बदलाव का संकेत है, जहां कंपनियां चार्जिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी को देखते हुए प्योर इलेक्ट्रिक से हटकर नए विकल्प तलाश रही हैं।
निवेशकों के लिए अहम जानकारी
शेयरधारकों को अब सरकार के रुख पर बारीकी से नजर रखनी चाहिए। टैक्स फ्रेमवर्क ही वह ट्रिगर होगा जिससे कंपनी आक्रामक तरीके से गाड़ियों की कीमतें तय कर पाएगी। साथ ही, मैनेजमेंट की कमेंट्री पर नजर रखें कि वे कब तक इनकी पहली कमर्शियल लॉन्चिंग की योजना बना रहे हैं और कैसे वे अपनी मौजूदा इलेक्ट्रिक और हाइब्रिड इन्वेस्टमेंट के बीच बैलेंस बनाएंगे।
