कॉमर्स मिनिस्टर पीयूष गोयल ने SIAM के 66वें सालाना कन्वेंशन में ग्लोबल ऑटो कंपनियों को सख्त चेतावनी दी है। सरकार अब उन कंपनियों पर नजर रख रही है जो केवल नाममात्र की वैल्यू एडिशन कर रही हैं, जिससे भविष्य में कंपनियों की पॉलिसी और स्ट्रेटजी बदल सकती है।
कॉमर्स और इंडस्ट्री मिनिस्टर पीयूष गोयल ने 3 सितंबर, 2026 को SIAM के 66वें सालाना कन्वेंशन में ऑटो सेक्टर को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। मंत्री ने उन ग्लोबल कार निर्माताओं को खरी-खोटी सुनाई जो भारत में सिर्फ 10% से 15% तक ही वैल्यू एडिशन करते हैं, लेकिन खुद को पूरी तरह 'मेड इन इंडिया' बताते हैं। सरकार का साफ संदेश है कि अब भारी-भरकम इम्पोर्टेड कल-पुर्जों पर निर्भर रहने वाले और घरेलू निवेश से बचने वाले कंपनियों को रियायत नहीं दी जाएगी।\n\nइस सख्ती को लागू करने के लिए, मिनिस्ट्री ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री अब एडवांस डेटा एनालिटिक्स का इस्तेमाल कर रही है। कंपनियों के Import Export Code (IEC) के जरिए सरकार उन फर्मों की पहचान कर रही है, जो सिर्फ असेंबली का काम करती हैं और बाकी सब कुछ बाहर से मंगाती हैं। पीयूष गोयल का मानना है कि इन कंपनियों को भारत के आर्थिक लक्ष्यों के साथ तालमेल बिठाना ही होगा।\n\nयदि कंपनियां तुरंत गहराई से 'लोकल' होना शुरू नहीं कर पा रही हैं, तो मंत्री ने उन्हें भारत से अपना एक्सपोर्ट बढ़ाने की सलाह दी है। यह कदम सरकार के इस साल $1 ट्रिलियन के कुल गुड्स और सर्विसेज एक्सपोर्ट के लक्ष्य को पाने के लिए जरूरी है।\n\n### निवेशकों के लिए क्या है संकेत?\n\nइस सरकारी रुख का सीधा असर ऑटोमोबाइल ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर्स (OEMs) पर पड़ सकता है। जो कंपनियां मुख्य रूप से इम्पोर्टेड CKD किट्स पर निर्भर हैं, उन्हें अपनी सप्लाई चेन बदलनी पड़ सकती है। अगर कंपनियां ज्यादा 'लोकल' होने के लिए मजबूर होती हैं, तो उनका कैपिटल खर्च (Capex) बढ़ सकता है, जिसका असर शॉर्ट से मीडियम टर्म में उनके प्रॉफिट मार्जिन पर दिख सकता है। फिलहाल कोई पेनाल्टी तो नहीं लगी है, लेकिन भविष्य में मिलने वाली सरकारी इंसेंटिव्स अब लोकल सोर्सिंग से सीधे जुड़ी हो सकती हैं।
