प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय ऑटो सेक्टर को घरेलू सीमाओं से बाहर निकलकर ग्लोबल मार्केट में अपनी धाक जमाने की चुनौती दी है। सरकार ने FTAs और PLI स्कीम के जरिए निर्यात बढ़ाने का लक्ष्य रखा है, जबकि ऑटो कंपोनेंट इंडस्ट्री ने फाइनेंशियल ईयर 2030 तक **$200 बिलियन** के टर्नओवर का सपना देखा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ACMA के 66वें सालाना अधिवेशन में साफ किया है कि अब भारतीय मैन्युफैक्चरर्स को सिर्फ स्थानीय मांग तक सीमित नहीं रहना चाहिए। सरकार अब अपनी रणनीति के तीन मुख्य स्तंभों पर काम कर रही है: हालिया फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स (FTAs), प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम, और बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर से लॉजिस्टिक्स कॉस्ट को कम करना।
सरकार की बड़ी योजना
केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल और एच.डी. कुमारस्वामी ने इस बात पर जोर दिया कि भारत ने पिछले कुछ सालों में 38 विकसित अर्थव्यवस्थाओं के साथ व्यापार सौदे किए हैं। इसका मकसद भारतीय ऑटो कंपनियों को विदेशों में मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने के लिए प्रोत्साहित करना है ताकि वे ग्लोबल सप्लाई चेन का हिस्सा बन सकें।
लक्ष्य और चुनौतियां
ऑटो कंपोनेंट सेक्टर ने फाइनेंशियल ईयर 2030 तक $200 बिलियन टर्नओवर का टारगेट रखा है। इसके लिए कंपनियों को अब बेसिक वॉल्यूम-आधारित प्रोडक्शन से हटकर टेक्नोलॉजी-ड्रिवन और वैल्यू-एडेड प्रोडक्शन की तरफ जाना होगा, खास तौर पर इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) सेगमेंट में।
हालांकि, यह राह आसान नहीं है। EV टेक्नोलॉजी में भारी कैपिटल एक्सपेंडिचर (CapEx) छोटे मैन्युफैक्चरर्स के बैलेंस शीट पर दबाव डाल सकता है। साथ ही, कच्चे माल की अस्थिर कीमतें, एनर्जी कॉस्ट और ग्लोबल डिमांड में उतार-चढ़ाव जैसे बाहरी दबाव मुनाफे पर असर डाल सकते हैं। निवेशकों के लिए अब यह देखना दिलचस्प होगा कि कंपनियां अपनी कैपिटल स्पेंडिंग और तकनीक को कैसे मैनेज करती हैं।
