PM E-DRIVE योजना ने 26.5 लाख EV बिक्री को दिया बढ़ावा, चार्जिंग स्टेशन अभी भी बाकी!

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AuthorAditya Rao|Published at:
PM E-DRIVE योजना ने 26.5 लाख EV बिक्री को दिया बढ़ावा, चार्जिंग स्टेशन अभी भी बाकी!

भारत की PM E-DRIVE योजना ने जुलाई 2026 तक 26.5 लाख इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) की बिक्री में मदद की है, जिसके लिए ₹10,900 करोड़ के बजट में से ₹2,322 करोड़ खर्च हो चुके हैं। जहां वाहनों की स्वीकार्यता बढ़ रही है, वहीं स्वीकृत सार्वजनिक चार्जिंग स्टेशनों की स्थापना अभी तक शुरू नहीं हुई है। निवेशकों को इस बात पर नज़र रखनी चाहिए कि दिल्ली जैसे राज्यों के नियामक बदलाव चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की गति और लंबी अवधि की EV मांग को कैसे प्रभावित करते हैं।

PM E-DRIVE: EV बिक्री में तेजी, पर इंफ्रास्ट्रक्चर में देरी

भारत सरकार की PM E-DRIVE स्कीम, जो अप्रैल 2024 से मार्च 2028 तक चलने वाली है, ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। 22 जुलाई 2026 तक, इस योजना के तहत 26.5 लाख इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) की बिक्री को समर्थन मिला है। इस योजना के लिए कुल ₹10,900 करोड़ का बजट रखा गया था, जिसमें से ₹2,322 करोड़ पहले ही इस्तेमाल हो चुके हैं। इस योजना का सबसे ज़्यादा फायदा इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर्स को मिला है, जिनकी बिक्री 23.8 लाख यूनिट्स रही। वहीं, L5 कैटेगरी के इलेक्ट्रिक थ्री-व्हीलर्स की संख्या 2.68 लाख यूनिट्स है।

महाराष्ट्र इस मामले में सबसे आगे है, जहां इस योजना के तहत 4.28 लाख वाहन बिके हैं। इसके बाद उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु और मध्य प्रदेश जैसे राज्य भी अच्छी संख्या में EV अपना रहे हैं। यह दिखाता है कि इलेक्ट्रिक मोबिलिटी का बाजार धीरे-धीरे फैल रहा है, हालांकि योजना की सफलता सरकार द्वारा दिए जा रहे सेगमेंट-स्पेसिफिक इंसेंटिव्स पर टिकी हुई है।

चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी और नियम

जहां एक ओर गाड़ियों की बिक्री अच्छी चल रही है, वहीं सपोर्टिंग चार्जिंग इकोसिस्टम के विकास में एक बड़ी रुकावट आ रही है। सरकार ने 6,562 पब्लिक EV चार्जिंग स्टेशन स्वीकृत किए हैं, जिनमें कर्नाटक में सबसे ज़्यादा 1,571 स्टेशन मंजूर हुए हैं। इसके बाद दिल्ली और राजस्थान का नंबर आता है। लेकिन, जुलाई 2026 के अंत तक के आंकड़ों के अनुसार, इनमें से एक भी स्वीकृत चार्जर असल में इंस्टॉल नहीं हुआ है। यह इस बात का संकेत है कि योजना का इंफ्रास्ट्रक्चर वाला हिस्सा अभी शुरुआती दौर में है, जो पब्लिक चार्जिंग पर निर्भर रहने वाले संभावित EV खरीदारों के भरोसे को लंबे समय में प्रभावित कर सकता है।

इस समस्या से निपटने के लिए, दिल्ली इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेटरी कमीशन (DERC) ने एक अहम बदलाव किया है। चार्ज पॉइंट ऑपरेटर्स के लिए PM E-DRIVE स्कीम के तहत सब्सिडी का दावा करना आसान बनाने के लिए, अपस्ट्रीम इलेक्ट्रिसिटी इंफ्रास्ट्रक्चर की लागत को डिस्ट्रिब्यूशन कंपनी के डिमांड नोट्स में शामिल करने की अनुमति दी गई है। इस कदम से प्रोजेक्ट की फाइनेंशियल वायबिलिटी सुधरेगी और चार्जिंग नेटवर्क में प्राइवेट सेक्टर के निवेश को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

घरेलू मैन्युफैक्चरिंग और टेस्टिंग पर फोकस

गाड़ियों और इंफ्रास्ट्रक्चर के इंसेंटिव्स के अलावा, यह स्कीम 'फेज्ड मैन्युफैक्चरिंग प्रोग्राम' पर भी ज़ोर दे रही है। इसका मकसद इलेक्ट्रिक गाड़ियां, बैटरी पैक और ज़रूरी कंपोनेंट्स के लोकल प्रोडक्शन को मजबूत करना है, ताकि इंपोर्ट पर निर्भरता कम हो सके। इसके साथ ही, सरकार ने 4 प्रमुख EV टेस्टिंग एजेंसियों को अपग्रेड करने के लिए ₹780 करोड़ अलग रखे हैं। इस निवेश से भारतीय सड़कों पर बढ़ रहे EVs के लिए डोमेस्टिक सर्टिफिकेशन और सेफ्टी स्टैंडर्ड्स को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी।

आने वाले महीनों में निवेशकों के लिए सबसे ज़रूरी बात यह होगी कि स्वीकृत चार्जिंग स्टेशनों के लगने की रफ्तार क्या रहती है। दिल्ली जैसे रेगुलेटरी सरलीकरण एक अच्छा कदम हैं, लेकिन कंपनियों द्वारा इन प्रोजेक्ट्स को पूरा करने और चार्जर इंस्टॉल करने की असल गति ही तय करेगी कि इंफ्रास्ट्रक्चर, इलेक्ट्रिक वाहनों की तेज़ी से बढ़ती बिक्री के साथ तालमेल बिठा पाएगा या नहीं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.